संकलन और संपादन – निकिता देवासे
बोथली – एक साल… यादें और सीख
— रोहिणी कालभूत

देखते ही देखते बोथली बेडा पर मेरा एक साल पूरा हो गया। समय कैसे बीत गया, पता ही नहीं चला, लेकिन इस एक साल ने मुझे बहुत कुछ दिया — अनुभव, सीख और सबसे महत्वपूर्ण बच्चों के साथ जुड़ा एक खूबसूरत रिश्ता।
यह सफर केवल सिखाने का नहीं, बल्कि सीखने का भी था। इस पूरे साल में मैंने बच्चों को बहुत कुछ सिखाया, लेकिन उसी समय बच्चों से भी बहुत कुछ सीखने को मिला। उनकी छोटी-छोटी प्रगति, उनके प्रयास और उनकी खुशी से मुझे बहुत कुछ महसूस हुआ। बच्चों की प्रगति, उनके व्यवहार में आया आत्मविश्वास, माता-पिता का बढ़ता भरोसा और उनका मिला support देखकर मन बहुत खुश हो जाता था। पूरा साल हमने खेलते-सीखते, बातें करते, हँसते-खेलते और ढेर सारी यादें बनाते हुए बिताया। हर दिन कुछ नया लेकर आता था।
इस पूरे सफर को याद करने, बच्चों ने क्या सीखा यह बताने और अगले साल को और अधिक उत्साह और ऊर्जा के साथ शुरू करने के लिए हमने बेडा क्लोजिंग आयोजित की। मेरे लिए यह दिन बहुत खास था, क्योंकि मेरे प्रयासों के सुंदर परिणाम मेरे सामने थे। माता-पिता से मिलने वाला सकारात्मक प्रतिसाद और उनके चेहरे पर दिखाई देने वाला विश्वास मेरे लिए बहुत बड़ा संतोष था।
बच्चों के लिए हमने एक छोटा सा मंच तैयार किया था, जहाँ वे खुलकर और पूरे दिल से अपनी बातें कह रहे थे। कुछ बच्चे थोड़े शर्मीले थे, लेकिन फिर भी उन्होंने हिम्मत के साथ अपने विचार व्यक्त किए। सबसे खास पल वह थे, जब बच्चों ने अपने हाथों से बनाए हुए cards हाथ में लिए। उन्हें पढ़ते समय उनके चेहरे की खुशी, आँखों की चमक और खुद पर गर्व देखकर मन भावुक हो गया।
सालभर में हमने जो सीखा और अनुभव किया, उन सभी तस्वीरों को देखते समय बच्चों का उत्साह अलग ही स्तर पर था।
“मैं ताई के साथ हूँ”, “मैं chess खेल रहा हूँ”, “मैं dance कर रहा हूँ” — ऐसा कहते हुए वे हर तस्वीर से खुद को जोड़ रहे थे। उनकी मासूम खुशी देखकर मुझे बहुत संतोष मिला। बच्चों के साथ बिताया गया समय, साथ में किया गया नाश्ता, डांस, गेम्स और हँसी-मजाक से पूरा वातावरण खुशी से भर गया। वह दिन सिर्फ एक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि हम सभी की यादों का उत्सव था। और इसी तरह हमारी बेडा क्लोजिंग बहुत खुशी और सफलता के साथ संपन्न हुई।
यह सफर यहीं खत्म नहीं होता…
अगला साल नई ऊर्जा, नए सपनों और और भी खूबसूरत यादों के साथ शुरू होगा, इसका पूरा विश्वास है।.
चक्रीघाट – अपनेपन का एहसास
— कोमल गौतम

आज जब मैं रणूभाई के बेडा पर गई, तो उन्होंने मुझे देखते ही मुस्कुराते हुए कहा,
“दीदी, आप बहुत दिनों के बाद आये… हमें भी अच्छा लगता है जब आप आते हो। क्योंकि हमारे यहाँ आप जैसे बाहर के लोग नहीं रुकते। जो दीदी बच्चों को पढ़ाने आती हैं, वही दीदी हमारे यहाँ रुकती हैं।”
उनकी ये बातें सुनकर मेरा मन भावुक हो गया। उनके शब्दों में अपनापन और प्यार साफ महसूस हो रहा था। चक्रीघाट से यह बेडा स्थलांतरित होने के बाद हम यहाँ नहीं आ पाए थे। यहाँ केवल एक ही बच्चा था और कुछ अन्य कारणों से यहाँ आना संभव नहीं हो पा रहा था। फिर भी रणूभैया हमेशा आग्रह से कहते थे, “दीदी, आप एक बार बेडे पे जरूर आना।” उनका वह आग्रह और मेरे मन की इच्छा आज आखिर पूरी हो गई।
आज जब मैं इस बेडा पर पहुँची, तो वहाँ पहुँचते ही एक अलग शांति और अपनापन महसूस हुआ। दीदी के साथ उनकी रोजमर्रा की जिंदगी, बच्चों और यहाँ की परिस्थितियों के बारे में बहुत सारी बातें हुईं। बेडा पर रहने वाले भैय्यों के साथ भी कई विषयों पर खुलकर बातचीत हुई। उनके जीवन, संघर्षों और उम्मीदों के बारे में सुनते हुए मुझे बहुत कुछ समझने को मिला। बातों-बातों में मैंने उन्हें बताया कि अब मेरी fellowship समाप्त हो गई है। यह सुनकर उन्होंने बहुत प्यार और अपनत्व से कहा,
“ये आपका ही घर है दीदी… आप कभी भी यहाँ आने के लिए ज्यादा सोचना मत।” उनके ये शब्द मेरे दिल को छू गए। उस एक वाक्य में इतना प्यार, अपनापन और विश्वास था कि कुछ पल के लिए मैं शब्दहीन हो गई।
आज का यह अनुभव सिर्फ एक मुलाकात नहीं था, बल्कि एक रिश्ते को फिर से महसूस करने का पल था। इस मुलाकात से मुझे एहसास हुआ कि जहाँ हम प्यार और सच्चे मन से काम करते हैं, वहाँ हमारा एक घर बन जाता है। और वहाँ के लोग अपने बन जाते हैं। आज का दिन मेरे लिए बहुत खास और हमेशा याद रहने वाला है।.
ठणठण – माइग्रेशन के साथ शिक्षा की आशा
— डेविड सूर्यवंशी

मैं और प्रगति सुबह बेडा पर पहुँचे, तो देखा कि रेखा दीदी और विभा भैय्या अपनी गाड़ी में सारा सामान भर रहे थे। हम दोनों सोचने लगे कि वे इतनी जल्दी बाहर क्यों जा रहे हैं।
तब विभा भैय्या और रेखा दीदी ने बताया कि कळमना बेडा में गायों के चारे की बहुत समस्या हो रही थी। विभा भैय्या ने बताया कि वहाँ रोज गायों के चारे पर लगभग सात हजार रुपये खर्च हो रहे थे। साथ ही अब पहले की तरह ज्यादा दूध भी नहीं मिल रहा था। इसलिए उन्हें अपने छोटे बच्चों को साथ लेकर दूसरी जगह जाना पड़ रहा था।
वहाँ किसन और पुडू भी थे। किसन हमें बता रहा था कि, “अब हम कुही गाँव में आ गए हैं।” उसकी माँ ने बताया कि अब किसन हर गाँव का नाम पढ़ लेता है। वह अंग्रेज़ी में गाँवों के नाम पढ़ता है और फिर हमें बताता है, “इस गाँव का नाम यह है।” वह अपनी माँ और बेडा के लोगों को भी पढ़े हुए नाम बताता रहता है।
पहले शांत और शर्मीला लगने वाला किसन अब आत्मविश्वास के साथ बात करने लगा है। उसे अब थोड़ा-बहुत पढ़ना और लिखना भी आने लगा है। इससे उसके माता-पिता को भी शिक्षा का महत्व समझ में आने लगा है। रेखा दीदी कह रही थीं,
“अब हम अपने बच्चों को जरूर पढ़ाएंगे। हम किसन को स्कूल भेजने के बारे में सोच रहे हैं।”
उनकी ये बातें सुनकर हमें बहुत संतोष हुआ। लगातार एक जगह से दूसरी जगह जाने वाले इन परिवारों के जीवन में कई कठिनाइयाँ हैं, लेकिन फिर भी अपने बच्चों को पढ़ाने और आगे बढ़ाने की उनकी इच्छा बहुत प्रेरणादायक लगी।
इस तरह हमारी यह बेडा विज़िट हमारे लिए बहुत खास बन गई। इस मुलाकात से हमें समझ में आया कि परिस्थितियाँ कितनी भी कठिन क्यों न हों, शिक्षा की आशा और बच्चों के भविष्य के सपने इंसान को आगे बढ़ने की ताकत देते हैं।.
असोला – बेडा मैपिंग का अनुभव
— जीवन ढोक

मैं एक फेलो टीचर के रूप में असोला बेडा पर काम कर रहा हूँ। मेरा उद्देश्य इन लोगों के माइग्रेशन को समझना और वे जहाँ रहते हैं उन जगहों की लोकेशन की जानकारी प्राप्त करना है। इसी कारण मैंने बेडा मैपिंग की यात्रा शुरू की।
यह सफर बिल्कुल आसान नहीं था। शुरुआत में मुझे बहुत कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। कभी मुझे जंगलों से होकर जाना पड़ा, कभी नालों से गाड़ी निकालनी पड़ी, तो कभी नदी के किनारे सफर करना पड़ा। कई बार मैं गायों के साथ जंगल तक भी गया।रास्ते में किसान मुझे बताते थे कि जंगल में बाघ हैं, इसलिए सावधान रहना चाहिए। फिर भी मैं बिना डरे आगे बढ़ता रहा।
कभी तेज धूप में लंबा सफर करके मैं बच्चों तक पहुँचता था। सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि बच्चों को कैसे पढ़ाया जाए, क्योंकि वहाँ कोई स्कूल नहीं था। लेकिन मैंने हार नहीं मानी। मैंने पेड़ के नीचे, वाहन की छाया में और कभी मंदिर के पास बच्चों को पढ़ाना शुरू किया।
इस अनुभव से मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला। मैंने समझा कि भरवाड़ समुदाय किन-किन क्षेत्रों में जाता है, किन जिलों में माइग्रेट करता है और किन जगहों पर कुछ समय के लिए रुकता है। साथ ही मैंने यह भी करीब से देखा कि बच्चे माइग्रेशन के दौरान कैसे पढ़ाई करते हैं और साथ ही काम भी संभालते हैं।
मैंने इन सभी जगहों का मैपिंग करके एक नक्शा तैयार किया। इस पूरी प्रक्रिया ने मुझे सिर्फ शिक्षा देने का अनुभव ही नहीं दिया, बल्कि जीवन को समझने की एक नई दृष्टि भी दी।
आखिर में मुझे एक बात समझ आई — कोई भी सीख कभी व्यर्थ नहीं जाती। अनुभव से मिली शिक्षा हमें जीवन में बहुत आगे लेकर जाती है।.