संकलन एवं संपादन – पल्लवी शंभरकर
चक्रीघाट – मिट्टी से कल्पना तक – बच्चों ने खुद बनाई अपनी दुनिया
– नविनता डोंगरे

जब बच्चों को खुद कुछ करने और अपनी कल्पनाओं को आज़माने की आज़ादी मिलती है, तो वे अपनी सोच को वास्तविक रूप दे सकते हैं। बच्चों के साथ काम करते हुए मिला यह अनुभव मुझे एक बार फिर इस बात का एहसास कराने वाला था।
एक दिन बच्चों ने मिलकर अपना एक छोटा-सा खेत बनाने का फैसला किया। उन्होंने आसपास उपलब्ध मिट्टी, लकड़ियों और रस्सी का इस्तेमाल करके खेत की जगह तैयार की। लकड़ियाँ गाड़कर और रस्सी बाँधकर उन्होंने खेत को आकार दिया। इसके बाद बीज बोने, पानी देने और पौधों की देखभाल करने जैसे सभी काम बच्चों ने खुद किए।
लेकिन बच्चों की कल्पनाएँ यहीं तक सीमित नहीं रहीं! मोबाइल पर एक पुल देखने के बाद उन्हें अपने खेत के पास भी एक छोटा-सा पुल बनाने का विचार आया। फिर बच्चों ने मिट्टी, लकड़ियों और आसपास उपलब्ध चीज़ों की मदद से पुल बनाना शुरू किया। पुल कैसे बनाया जाए, लकड़ी कहाँ रखी जाए और मिट्टी का उपयोग किस तरह किया जाए, इस पर बच्चों के बीच चर्चा होने लगी। एक-दूसरे के विचार सुनते हुए, अलग-अलग प्रयास करते हुए और ज़रूरत के अनुसार बदलाव करते हुए उन्होंने अपना छोटा-सा पुल तैयार कर लिया।
इस पूरी प्रक्रिया में बच्चे केवल खेत और पुल नहीं बना रहे थे, बल्कि वे निरीक्षण कर रहे थे, योजना बना रहे थे, सवाल पूछ रहे थे और समस्याओं का समाधान खुद खोज रहे थे। साथ मिलकर काम करते हुए एक-दूसरे के विचारों को समझना और उनसे कुछ नया बनाना भी इस अनुभव का महत्वपूर्ण हिस्सा था।
इस अनुभव से मुझे महसूस हुआ कि बच्चों के लिए हर चीज़ तैयार करके देने के बजाय उन्हें खुद करके देखने के अवसर और स्वतंत्रता देना अधिक महत्वपूर्ण है। ऐसे अवसरों पर बच्चे केवल निर्देशों का पालन नहीं करते, बल्कि खुद सोचते हैं, निर्णय लेते हैं और अपनी कल्पनाओं को वास्तविक रूप देते हैं।
शायद कुछ दिनों बाद उनका यह छोटा-सा खेत और पुल वहाँ न रहे, लेकिन “मैं खुद कुछ बना सकता हूँ!” यह विश्वास उनके मन में विकसित होने में ज़रूर मदद करेगा। मेरे लिए इस अनुभव की सबसे खूबसूरत बात यही थी कि बच्चों ने मिट्टी से खेत बनाया, खेत तक पहुँचने के लिए पुल बनाया और साथ ही अपनी कल्पनाओं पर विश्वास करना तथा मिलकर कुछ नया रचना भी सीखा।
सोनखांब – तेजल का सीखने की ओर प्रेरणादायक सफर
– देवेंद्र राऊत

सोनखांब बेड़े में रहने वाली और कक्षा चौथी में पढ़ने वाली तेजल एक मेहनती, उत्साही और सीखने में रुचि रखने वाली बच्ची है। घर की ज़िम्मेदारियों में माता-पिता की मदद करने के साथ-साथ वह नियमित रूप से स्कूल भी जाती है।
तेजल की सीखने की यात्रा में धीरे-धीरे सकारात्मक बदलाव देखने को मिल रहे हैं। अब वह केवल किताबें पढ़ने तक सीमित नहीं है, बल्कि पढ़ी हुई कहानियों को समझने, उन पर विचार करने और अपने विचार व्यक्त करने का भी प्रयास करती है। उसके अंदर बढ़ता आत्मविश्वास और सीखने के प्रति बढ़ती रुचि उसकी प्रगति को दर्शाती है।
तेजल को नृत्य करने से लेकर किताबें पढ़ने तक, अलग-अलग गतिविधियों में उत्साहपूर्वक भाग लेते देखना बहुत आनंददायक है। नई चीज़ें जानने की जिज्ञासा, प्रयास करने की तत्परता और लगातार सीखते रहने की इच्छा उसकी क्षमताओं को दर्शाती है।
तेजल की यह यात्रा केवल शैक्षणिक प्रगति की नहीं, बल्कि खुद पर विश्वास रखते हुए आगे बढ़ने की भी है। घर की ज़िम्मेदारियों और पढ़ाई के बीच संतुलन बनाते हुए वह अपने रास्ते पर आगे बढ़ रही है। उसे सही अवसर, प्रोत्साहन और सीखने के लिए अनुकूल वातावरण मिलता रहे, तो वह भविष्य में और भी बेहतर प्रगति कर सकती है।
तेजल का सफर हमें सिखाता है कि हर बच्चे में सीखने की क्षमता होती है। ज़रूरत है उस क्षमता को पहचानने, बच्चों को अपने विचार व्यक्त करने के अवसर देने और उनकी हर छोटी-बड़ी प्रगति को प्रोत्साहित करने की।
आसोला – बच्चों को समझते हुए सीखने का सफर
– मिननाथ दडमल

मैं मीननाथ, असोला बेड़े में प्राथमिक स्तर के बच्चों के साथ काम करता हूँ। मेरे लिए यह अनुभव बहुत महत्वपूर्ण और सीखने के कई अवसर देने वाला है। बच्चों को पढ़ाते हुए और उनके साथ काम करते हुए मुझे उनकी सीखने की प्रक्रिया के बारे में कई नई बातें समझने को मिल रही हैं।
बच्चों की उम्र के अनुसार उन्हें कैसे समझें, वे अलग-अलग विषयों को कैसे सीखते हैं और सीखते समय उन्हें किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, यह जानने का मेरा प्रयास जारी है।
अंग्रेज़ी भाषा और अन्य विषयों को सीखते समय बच्चे क्या और कितना समझ पाते हैं, यह जानने के लिए मैंने अलग-अलग प्रयोग किए हैं। साथ ही, कुछ बच्चों की सीखने की प्रक्रिया को गहराई से समझने के लिए केस स्टडी करने का भी प्रयास किया है। इस प्रक्रिया से मुझे बच्चों को बेहतर ढंग से समझने और उनकी ज़रूरतों के अनुसार पढ़ाने के तरीकों पर काम करने का अवसर मिल रहा है।
मेरा प्रयास रहता है कि बच्चों को केवल पढ़ाने के लिए न पढ़ाया जाए, बल्कि वे जो सीख रहे हैं, उसका उपयोग अपने दैनिक जीवन और भविष्य में कैसे कर सकते हैं, इस बात को ध्यान में रखकर पढ़ाया जाए। विशेष रूप से गणित पढ़ाते समय मेरा ध्यान इस बात पर रहता है कि बच्चे गणित को अपने वास्तविक जीवन से जोड़कर समझ सकें। दैनिक व्यवहार और अपने आसपास के अनुभवों के माध्यम से बच्चे गणित कैसे सीख सकते हैं, इस पर मेरे प्रयोग जारी हैं।
पिछले कुछ दिनों में मैंने गणित को लेकर बच्चों का रिफ्लेक्शन लिया। मैंने यह समझने का प्रयास किया कि क्या बच्चे अपने जीवन में गणित से जुड़े अनुभवों को पहचान सकते हैं, उन्हें अपने शब्दों में बता सकते हैं और दैनिक जीवन में गणित के उपयोग को समझ सकते हैं। इस बातचीत से मुझे बच्चों की समझ, उन्हें आने वाली कठिनाइयों और आगे की योजना बनाने के लिए महत्वपूर्ण जानकारी मिली।
इस प्रक्रिया में यह भी सामने आया कि कुछ बच्चों को अपने अनुभवों और गणित की अवधारणाओं के बीच संबंध जोड़ने में कठिनाई होती है। इसलिए अब मैं इस बात पर प्रयोग कर रहा हूँ कि उन्हें दैनिक जीवन के उदाहरणों के माध्यम से गणित कैसे समझाया जाए और वे सीखे हुए गणित का उपयोग वास्तविक जीवन में कैसे कर सकें।
इस पूरे अनुभव से मुझे महसूस हो रहा है कि बच्चों को पढ़ाते समय केवल यह महत्वपूर्ण नहीं है कि हम उन्हें क्या सिखाते हैं, बल्कि यह समझना भी उतना ही ज़रूरी है कि बच्चे कैसे सीखते हैं, क्या समझते हैं और सीखी हुई बातों का अपने जीवन में कैसे उपयोग कर सकते हैं। यह यात्रा मुझे एक शिक्षक के रूप में लगातार सीखने, अपनी शिक्षण पद्धतियों पर विचार करने और नए प्रयोग करने का अवसर दे रही है।
जुनापाणी – सौंदर्य की दुनिया से नई पहचान… अनुभव से सीखने का नया अवसर!
– दिपांशु देवासे

बच्चों को सीखने के अलग-अलग अवसर मिलें और वे अपने आसपास के विभिन्न व्यवसायों से परिचित हों, इसी उद्देश्य से उन्हें एक अनोखा अनुभव मिला। मेरी ब्यूटी पार्लर चलाने वाली दोस्त ने हमारे Beda का दौरा किया। इस मुलाकात के माध्यम से बच्चों को सौंदर्य के क्षेत्र के बारे में जानने का अवसर मिला।
इस मुलाकात के दौरान बच्चों ने ब्यूटी पार्लर में इस्तेमाल होने वाले विभिन्न उत्पादों, मेकअप के सामान और अलग-अलग टूल्स के बारे में जाना। ये सभी चीज़ें बच्चों के लिए नई थीं, इसलिए उनके मन में कई सवाल आए। उन्होंने उत्सुकता से हर वस्तु के बारे में पूछा, उसके उपयोग को समझा और अपने हाथों से कुछ टूल्स का इस्तेमाल करके भी देखा।
मेकअप कैसे किया जाता है, अलग-अलग उत्पादों का उपयोग कैसे होता है और प्रत्येक टूल का क्या काम होता है, यह जानने के लिए बच्चे बहुत उत्साहित थे। उन्होंने केवल चीज़ों को देखने तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि सवाल पूछकर, ध्यान से निरीक्षण करके और प्रत्यक्ष अनुभव के माध्यम से नई बातें समझने का प्रयास किया।
यह मुलाकात बच्चों के लिए केवल एक नए व्यवसाय को जानने का अवसर नहीं थी, बल्कि अनुभव के माध्यम से सीखने का एक आनंददायक मौका भी थी। इस अनुभव से बच्चों को नई चीज़ों के बारे में जानने, अपने मन के सवाल पूछने और स्वयं करके सीखने का अवसर मिला। जब बच्चों को अपने आसपास की दुनिया से जुड़कर, अनुभव और गतिविधियों के माध्यम से सीखने का अवसर मिलता है, तो उनकी सीखने की प्रक्रिया को एक नई दिशा मिलती है।
बोथली – जन्माष्टमी कार्यक्रम की खूबसूरत यादें
– रोहिणी कालभूत

हमारे स्कूल में जन्माष्टमी का त्योहार बड़े उत्साह और खुशी के साथ मनाया गया। इस कार्यक्रम के लिए स्कूल के बच्चों के साथ-साथ हमारे बेड़े के भारवाड बच्चों ने भी उत्साहपूर्वक तैयारी की। सभी बच्चे सुंदर वेशभूषा में सजकर कार्यक्रम में शामिल हुए।
इस कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण स्कूल के बच्चों और भारवाड बच्चों द्वारा मिलकर प्रस्तुत किया गया नाटक था। हमारे बच्चों ने राधा और कृष्ण की सुंदर वेशभूषा धारण की थी। बच्चों ने नाटक के माध्यम से श्रीकृष्ण के जीवन की विभिन्न घटनाओं को बहुत सुंदर तरीके से प्रस्तुत किया। इसके लिए सभी बच्चों ने एक साथ अभ्यास किया और एक-दूसरे का सहयोग करते हुए कार्यक्रम की तैयारी पूरी की।
इस पूरी प्रक्रिया में बच्चों को केवल नाटक प्रस्तुत करने का ही अवसर नहीं मिला, बल्कि उन्होंने मिलकर काम करना, एक-दूसरे के साथ तालमेल बिठाना और अपने विचारों को व्यक्त करना भी सीखा। स्कूल के बच्चों और भारवाड बच्चों के बीच दिखाई देने वाला समन्वय और उत्साह बहुत आनंददायक था।
ऐसी गतिविधियों के माध्यम से बच्चों को एक-दूसरे के साथ सीखने, नए अनुभव प्राप्त करने और अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर मिलता है। सभी ने मिलकर खुशी और उत्साह के साथ जन्माष्टमी का त्योहार मनाया। यह कार्यक्रम बच्चों के लिए एक आनंददायक और यादगार अनुभव बन गया।
ठणठण – पालक सभा – यादें, खुशियाँ और रिश्तों की मज़बूत डोर
– डेविड सूर्यवंशी

आज की पालकसभा मेरे लिए बहुत आनंददायक और यादगार रही। समुदाय के लोगों और बच्चों को पहले से ही पता था कि आज पालकसभा होने वाली है। इस बार खुशी की एक और बात थी कि गणेश भैया काफी दिनों बाद इस पालकसभा में शामिल होने वाले थे। इसलिए बच्चे बहुत उत्साहित थे।
उन्होंने गणेश भैया के स्वागत के लिए एक नाटक प्रस्तुत करने की योजना बनाई थी। बच्चों का उत्साह, उनकी तैयारी और कुछ नया करने की इच्छा देखकर बहुत अच्छा लगा।
शुरुआत में पालकसभा के लिए हमेशा से अलग जगह चुनी गई थी, लेकिन अचानक बारिश शुरू हो गई और हमारे सामने सवाल था कि पालकसभा कहाँ आयोजित की जाए। तभी एक बच्चे ने आगे बढ़कर कहा, “सर, जहाँ गणपति विराजमान हैं, वहाँ हम पालकसभा कर सकते हैं।” बच्चे की यह बात सुनकर मुझे बहुत खुशी हुई। मुझे महसूस हुआ कि जिस काम के लिए हम प्रयास कर रहे हैं, उसकी ज़िम्मेदारी बच्चे भी समझने लगे हैं और परिस्थितियों के अनुसार समाधान खोजने की पहल कर रहे हैं।
रात करीब सात बजे तेज़ बारिश होने के बावजूद हमने पालकसभा आयोजित करने का निर्णय लिया। परिस्थिति चुनौतीपूर्ण थी, लेकिन बच्चों और समुदाय के लोगों का अच्छा सहयोग मिला। सभी के प्रयासों से पालकसभा सफलतापूर्वक पूरी हुई। पालकसभा में बच्चों की शैक्षणिक प्रगति सभी के साथ साझा की गई। इसके साथ ही बच्चों ने नाटक प्रस्तुत करके अपनी कला, आत्मविश्वास और सहभागिता का सुंदर प्रदर्शन किया। उनके प्रदर्शन से उनके अंदर आ रहे बदलावों को महसूस करने का अवसर मिला।
इस अनुभव से मुझे समझ आया कि पालकसभा केवल बच्चों की प्रगति पर चर्चा करने तक सीमित नहीं होती, बल्कि यह बच्चों, पालकों और शिक्षकों के बीच संबंधों को मज़बूत करने का एक महत्वपूर्ण अवसर भी है। जब पालक बच्चों की प्रगति को देखते हैं और बच्चों को अपनी प्रतिभा दिखाने तथा अपने विचार व्यक्त करने का अवसर मिलता है, तो एक-दूसरे के प्रति विश्वास और भी बढ़ता है।
आज की पालकसभा ने मुझे सिखाया कि बच्चों की पहल, पालकों की भागीदारी और शिक्षकों के प्रयास जब एक साथ आते हैं, तो सीखने की प्रक्रिया और भी सार्थक बन जाती है। यह केवल एक पालकसभा नहीं थी, बल्कि बच्चों, पालकों, शिक्षकों और समुदाय को एक साथ जोड़ने वाला खूबसूरत अनुभव था। बारिश, बच्चों का उत्साह और सभी का सहयोग इस दिन को मेरे लिए हमेशा यादगार बनाए रखेंगे।