फोटो बुलेटिन सप्टेंबर २०२६
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संकलन एवं संपादन – पल्लवी शंभरकर

ठणठण – 15 अगस्त – बच्चों के सीखने और नेतृत्व का सुंदर अनुभव

– प्रगती बांडेबूचे

हर साल की तरह इस साल भी बेड़े पर 15 अगस्त का स्वतंत्रता दिवस बड़े उत्साह के साथ मनाया गया। इस साल के celebration की सबसे खूबसूरत बात सभी मुखिया और माता-पिता की उपस्थिति रही। उनकी उपस्थिति में सिद्धू भैया और मफला भैया के हाथों ध्वजारोहण किया गया।

अपने बच्चों का कार्यक्रम देखने के लिए माता-पिता और समुदाय के लोग एक साथ आए, जिससे पूरे वातावरण में उत्साह और अपनापन महसूस हो रहा था।

इस दिन का सबसे खास आकर्षण बच्चों द्वारा प्रस्तुत किया गया नाटक रहा। कुछ दिन पहले एक वरिष्ठ व्यक्ति ने बच्चों से कहा था, “क्या पढ़ रहे हो? कुछ नहीं पढ़ने को आता है।” इस बात का बच्चों से एक अलग ही connect हुआ। इससे उनके मन में विचार आया, “हम भी सीख रहे हैं, हमें भी आता है और हम जो सीख रहे हैं, उसे दिखा भी सकते हैं।” इसी विचार के साथ बच्चों ने नाटक तैयार किया और उसे सभी के सामने प्रस्तुत किया।

कान्हा, साबू, पूजा, आशा, किंजल, काजल, रिद्धि और नरेश ने नाटक में उत्साहपूर्वक भाग लिया। पूजा ने मैडम की भूमिका निभाई, जबकि कान्हा ने Student Leader की भूमिका बहुत आत्मविश्वास के साथ निभाई। इस नाटक के माध्यम से बच्चों ने केवल संवाद ही प्रस्तुत नहीं किए, बल्कि अपनी सीखने की यात्रा, अपने प्रयास और खुद पर विश्वास भी पूरी community के सामने व्यक्त किया।

इस नाटक के माध्यम से बच्चों को community तक एक महत्वपूर्ण संदेश पहुँचाना था — “आप हमें जो कहते हैं, उसी से हम सीख रहे हैं। हम भी कोशिश कर रहे हैं और हमें भी बहुत कुछ आता है।” बच्चों ने यह संदेश बहुत आत्मविश्वास के साथ सभी तक पहुँचाया। सीखते समय किए गए उनके छोटे-छोटे प्रयास अब पूरी community के सामने खुद को व्यक्त करने के आत्मविश्वास में बदलते हुए दिखाई दिए।

इस दिन का एक और खूबसूरत हिस्सा सिद्धू भैया का बच्चों के साथ जुड़ना रहा। उन्होंने बच्चों को शिक्षा के लिए motivate किया और उनके पारंपरिक लाठी-काठी खेल के बारे में भी मार्गदर्शन दिया। उनके साथ बातचीत और सहभागिता से बच्चों को अपने community के बड़े लोगों से सीखने और उनसे जुड़ने का एक सुंदर अवसर मिला।

इस तरह 15 अगस्त का यह दिन केवल ध्वजारोहण और celebration तक सीमित नहीं रहा। यह बच्चों के learning, leadership, confidence और community connection का अनुभव देने वाला एक खूबसूरत दिन बन गया। उस दिन बच्चों ने सिर्फ यह कहा नहीं कि “हमें भी आता है”, बल्कि अपने काम और आत्मविश्वास के जरिए इसे करके भी दिखाया।

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आसोला – राखी सेलिब्रेशन का सुंदर अनुभव

– प्राची बोरेकर

आज हमने बच्चों के साथ राखी बनाने की गतिविधि लेकर राखी सेलिब्रेशन करने का तय किया। लेकिन शुरुआत में हमारे सामने एक छोटी-सी परेशानी थी—राखी बनाने के लिए हमारे पास सामान ही नहीं था।

हमें सिर्फ इतना पता था कि पिछले साल का कुछ सामान स्कूल में रखा हुआ है। काफी देर तक खोजने के बाद आखिरकार वह सामान सर के ऑफिस में मिला और हमने तुरंत राखी बनाना शुरू किया।

हमारे पास कुछ सुंदर स्टोन्स थे, लेकिन वे राखी पर चिपकाने के लिए नहीं थे। बच्चों को अपनी राखी पर स्टोन्स लगाना था। तभी बच्चों ने खुद ही एक शानदार उपाय खोज निकाला। वे घर गए, पुराने कपड़ों पर लगे स्टोन्स ढूँढकर लाए और उनका इस्तेमाल राखी बनाने में किया। बच्चों की यह creativity और problem-solving देखकर हमें बहुत खुशी हुई।

बच्चों के साथ राखी बनाते हुए हमें बहुत मजा आया और उनकी creativity को करीब से देखने का मौका मिला। हम रोज बच्चों को कुछ न कुछ सिखाते हैं, लेकिन आज राखी बनाते समय बच्चों ने ही हमें राखी बनाना सिखाया। स्कूल की मैडम ने भी हमें बहुत अच्छा response दिया और उनके creative तरीके से हमें भी कुछ नया सीखने का मौका मिला।

बच्चे उत्साह से कह रहे थे, “रुको मैडम, ऐसा नहीं… ऐसा बनाओ, मैं सिखाती हूँ तुमको!” इस एक वाक्य में ही आज के पूरे अनुभव का असली अर्थ छिपा था। हम बच्चों को बहुत कुछ सिखाते हैं, लेकिन उसी समय बच्चे भी हमें बहुत कुछ सिखाते हैं।

आज के राखी सेलिब्रेशन से हमें फिर से महसूस हुआ कि शिक्षा केवल सिखाने का माध्यम नहीं है, बल्कि एक-दूसरे से सीखने की प्रक्रिया भी है। इस छोटी-सी गतिविधि में बच्चों की creativity, problem-solving skills, आत्मविश्वास और खुद से कुछ करने की पहल देखने को मिली।

आज का दिन बच्चों के साथ खुशी, creativity, सीखने और खूबसूरत यादों से भरा रहा। इस छोटे से अनुभव ने हमें एक बड़ी बात सिखाई—सीखना हमेशा दो तरफा सफर होता है।

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सोनखांब – मैं भी कर सकता हूँ! – मयूर की सीखने की सुंदर यात्रा

– देवेंद्र राऊत

मयूर कक्षा 3 में पढ़ने वाला एक शांत और प्यारा बच्चा है। शुरुआत में उसके साथ काम करते समय मैंने महसूस किया कि वह सीखने की कोशिश तो करता था, लेकिन सिखाई गई बातों को याद रखना और दोबारा याद करके बताना उसके लिए मुश्किल था।

कक्षा 3 में होने के बावजूद उसे बुनियादी अंकों को पहचानने और अंग्रेज़ी पढ़ने में काफी कठिनाई होती थी। इसलिए मेरे सामने एक सवाल था—मयूर को उसकी अपनी गति से कैसे सिखाया जाए?

इस सवाल का जवाब खोजते हुए मैंने उसकी जरूरतों के अनुसार एक छोटा Learning Plan तैयार किया। गणित में हमने अंकों की पहचान से शुरुआत की, जबकि अंग्रेज़ी में Phonics Sounds और CVC Words का नियमित अभ्यास शुरू किया। शुरुआत में छोटी-छोटी चीज़ों को कई बार दोहराना पड़ता था। लगातार अभ्यास और धैर्य के साथ मयूर धीरे-धीरे चीज़ों को समझने और याद रखने लगा।

धीरे-धीरे बदलाव केवल उसकी पढ़ाई में ही नहीं, बल्कि सीखने के प्रति उसके रवैये में भी दिखाई देने लगा। वह नियमित रूप से स्कूल आने लगा, समय पर होमवर्क करने लगा और कक्षा की गतिविधियों में उत्साह से भाग लेने लगा। सबसे खास बात यह रही कि उसने खुद से छोटी-छोटी किताबें उठाकर पढ़ना शुरू कर दिया।

आज मयूर 50 तक के अंकों को पहचानता है और CVC Words आसानी से पढ़ लेता है। जो बच्चा पहले “मुझसे नहीं होगा” महसूस करता था, वह अब खुद सीखने की कोशिश करता है। अब उसे किताब पढ़ने के लिए किसी के कहने की जरूरत नहीं पड़ती; वह खुद किताब उठाता है और पढ़ना शुरू कर देता है।

मयूर की यात्रा हमें एक महत्वपूर्ण बात सिखाती है—हर बच्चे की सीखने की गति अलग होती है। सही तरीका, निरंतर अभ्यास, धैर्य और विश्वास दिया जाए, तो हर बच्चा अपनी क्षमता को पहचान सकता है और आगे बढ़ सकता है।

मयूर अभी भी सीख रहा है, लेकिन अब उसकी आँखों में एक नया आत्मविश्वास दिखाई देता है—“मैं भी कर सकता हूँ!”

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चक्रीघाट – भरवाड़ समुदाय की बेटियाँ बनीं शिक्षिका

– जीवन ढोक

भरवाड़ समुदाय के परिवारों का जीवन प्रवास से जुड़ा हुआ है। लगभग हर तीन महीने में परिवार अपने गाय-बैलों के साथ एक जगह से दूसरी जगह जाते हैं और बच्चे भी उनके साथ चले जाते हैं। इस वजह से बच्चों की शिक्षा को लगातार जारी रखना हमेशा से एक बड़ी चुनौती रही है।

लेकिन इस साल चक्रीघाट बेड़ा के बच्चों की शिक्षा में एक सुंदर और सकारात्मक बदलाव देखने को मिला।

शुरुआत में कई बच्चे कक्षा में ठीक से नहीं बैठते थे, शिक्षकों की बात नहीं सुनते थे और लगातार इधर-उधर घूमते रहते थे। लेकिन नियमित कक्षाओं, प्यार से किए गए मार्गदर्शन और लगातार प्रोत्साहन के कारण अब वे नियमित रूप से कक्षा में आने लगे हैं। उनमें अनुशासन, आत्मविश्वास और सीखने की रुचि विकसित होने लगी है। इस बदलाव में Student Leader पहल की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही।

इस पहल के माध्यम से भरवाड़ समुदाय की कुछ लड़कियाँ खुद सीखने के साथ-साथ रात में अपने छोटे भाई-बहनों को भी पढ़ाने लगीं। वे अपने सीखने की जिम्मेदारी लेने के साथ-साथ अपने भाई-बहनों की पढ़ाई में भी मदद करने लगीं। इसका सकारात्मक प्रभाव जगदीश और दिनेश जैसे बच्चों की सीखने की यात्रा में भी देखने को मिला।

शिक्षक दिवस के अवसर पर इन लड़कियों को खुद शिक्षिका की भूमिका निभाने का अवसर मिला। उनमें से वाली ने शिक्षकों का निरीक्षण करके मराठी का Activity-Based Learning क्लास लिया। उसने बच्चों को गोल घेरा बनाकर बैठाया और अलग-अलग गतिविधियों के माध्यम से उन्हें सिखाया। कुछ समय पहले जो लड़की खुद सीखने की प्रक्रिया में थी, वही आज कक्षा के सामने खड़े होकर दूसरे बच्चों को पढ़ा रही थी। बच्चों ने भी उसकी बात ध्यान से सुनी और उत्साहपूर्वक गतिविधियों में भाग लिया।

वाली का यह अनुभव केवल एक दिन की गतिविधि नहीं था, बल्कि उसके आत्मविश्वास और नेतृत्व क्षमता के विकास की यात्रा में एक महत्वपूर्ण कदम था। “मैं सीखती हूँ और दूसरों को भी सिखाती हूँ” की भूमिका निभाते हुए ये लड़कियाँ न केवल अपनी शिक्षा की जिम्मेदारी ले रही हैं, बल्कि अपने समुदाय के दूसरे बच्चों के लिए भी सीखने के नए अवसर तैयार कर रही हैं।

इस परिवर्तन के लिए Learning Companion संस्था पिछले चार-पाँच वर्षों से चक्रीघाट बेड़ा पर लगातार शिक्षा के क्षेत्र में काम कर रही है। Fellows और शिक्षकों के माध्यम से बच्चों को शिक्षा से जोड़ने और उन्हें नेतृत्व के अवसर देने के प्रयास लगातार किए जा रहे हैं। आज भरवाड़ समुदाय की ये लड़कियाँ केवल विद्यार्थी नहीं हैं, बल्कि शिक्षिका, मार्गदर्शक और दूसरे बच्चों के लिए प्रेरणास्रोत बन चुकी हैं।

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जुनापाणी – बदलाव की आहट… स्कूल की ओर दौड़ते कदम!

– दिपांशु देवासे

बेड़ा पर बना हमारा छोटा-सा स्कूल अब बच्चों के रोज़मर्रा के जीवन का एक खूबसूरत हिस्सा बन गया है। कुछ समय पहले स्कूल आना बच्चों के लिए इतना आसान और स्वाभाविक नहीं था, लेकिन आज वे खुद उत्साह के साथ स्कूल आने लगे हैं।

स्कूल आने से पहले नहाकर साफ कपड़े पहनकर आने की आदत भी बच्चों में विकसित हुई है।

जैसे ही हम बेड़ा पर पहुँचते हैं और बच्चों को हमारी आवाज़ सुनाई देती है, वे दूर से ही स्कूल की ओर दौड़ते हुए आते हैं। चेहरे पर मुस्कान और उत्साह के साथ वे खुशी से “Good Morning!” कहते हैं। उनका यह छोटा-सा अभिवादन स्कूल के प्रति उनके बढ़ते जुड़ाव और अपनापन को दिखाता है।

अब स्कूल उनके लिए केवल पढ़ाई करने की जगह नहीं रह गया है। यह ऐसी जगह बन गई है जहाँ वे खुशी से आते हैं, दोस्तों के साथ समय बिताते हैं, गतिविधियों में हिस्सा लेते हैं और हर दिन कुछ नया सीखते हैं। स्कूल आने की यह इच्छा उनके सीखने की यात्रा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

इस बदलाव के पीछे बच्चों के साथ लगातार किया गया काम, प्यार से किया गया मार्गदर्शन और सीखने को आनंददायक बनाने के प्रयास हैं। रोज़मर्रा की छोटी-छोटी आदतों और अनुभवों के माध्यम से बच्चों में जिम्मेदारी, आत्मविश्वास और सीखने के प्रति सकारात्मक सोच विकसित हो रही है।

आज बेड़ा पर बच्चों के स्कूल की ओर दौड़ते कदम देखकर महसूस होता है कि यह केवल स्कूल आने की आदत में आया बदलाव नहीं है, बल्कि बच्चों की सोच में आए एक छोटे लेकिन महत्वपूर्ण बदलाव की आहट है।

इस छोटे-से स्कूल से अब बड़े सपनों की शुरुआत हो रही है।

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ठणठण – सच में, बचपन बहुत अनमोल होता है!

– डेविड सूर्यवंशी

“सच में, बचपन बहुत अनमोल होता है!” अपनी कक्षा के बच्चों को देखकर यह बात बार-बार मन में आती है। बारिश हो या तेज़ धूप, ये बच्चे स्कूल आना नहीं छोड़ते।

उनके हर शब्द, हर सवाल और उनके छोटे-छोटे अनुभवों से मुझे हर दिन कुछ नया सीखने को मिलता है। अलग-अलग उम्र के ये बच्चे मेरे लिए सिर्फ विद्यार्थी नहीं, बल्कि मेरे अपने बच्चे हैं।

मेरे लिए बच्चों को पढ़ाना सिर्फ किताबों में दी गई बातें सिखाना नहीं है। मेरे लिए जरूरी है कि बच्चों के मन में छिपे विचार और भावनाएँ बाहर आएँ। इसलिए मैं बच्चों को ज्यादा से ज्यादा बोलने, सवाल पूछने और अपने अनुभव साझा करने के लिए प्रोत्साहित करता हूँ। इन बातचीत के माध्यम से बच्चों की भाषा का विकास होता है और यही समृद्ध भाषा आगे चलकर उनके पढ़ने-लिखने की मजबूत नींव बनती है।

हमारी कक्षा की शुरुआत बच्चों के लिए बनाए गए छोटे-छोटे नियमों से होती है। एक ताली बजाते ही बच्चों को हाथ जोड़कर बैठना होता है—यह हमारे कक्षा का एक आसान नियम है। इसके बाद शुरू होती है बातचीत। आज क्या खाना खाया? कौन-सी सब्ज़ी बनी थी? घर से कितनी रोटी खाकर आए? कुछ बच्चे बहुत कुछ बताते हैं, तो कुछ सिर्फ थोड़े शब्द बोलते हैं। लेकिन हर बच्चे की बात हमारे लिए महत्वपूर्ण है। कभी-कभी बच्चे मुझसे भी पूछते हैं, “सर, आपने खाना खा लिया?” और मुझे भी खुशी से उनका जवाब देना पड़ता है।

बातचीत के बाद हम गाने गाते हैं, खेल खेलते हैं और अलग-अलग गतिविधियाँ करते हैं। आज बच्चों ने बहुत उत्साह से गाने गाए। कुछ बच्चे ज़ोर से गा रहे थे, तो कुछ शांत होकर सुन रहे थे, लेकिन खुशी सभी के चेहरों पर थी। एक पेड़ के नीचे बैठकर बच्चे अलग-अलग तरीकों से सीखने की कोशिश कर रहे थे। उन्होंने छोटे-छोटे पत्थर इकट्ठे किए और अपने घरों के सामने खड़े होकर फोटो खिंचवाने की जिद की। “सर, फोटो डालो ना हमारी!” उनका यह मासूम आग्रह बहुत प्यारा लगा।

पढ़ाई के साथ-साथ बच्चों को अपना बचपन जीने का मौका मिले, इसलिए हम पारंपरिक खेल भी खेलते हैं—“आपली तुपली, गुळाची पापडी, धम्मक लाडू…” जैसे खेल बच्चों के लिए सिर्फ मनोरंजन नहीं हैं। इनके माध्यम से वे एक-दूसरे से बात करना, सुनना, अपनी बात कहना और आत्मविश्वास के साथ भाग लेना भी सीखते हैं।

इन बच्चों के साथ बिताया हर दिन मुझे एक महत्वपूर्ण बात सिखाता है—सीखना सिर्फ कक्षा या किताबों तक सीमित नहीं है; सीखना बातचीत, खेल, गाने, हँसी और रोज़मर्रा के अनुभवों में भी होता है। आज जब मैं अपने बच्चों को पहले से ज्यादा खुलकर बोलते और आत्मविश्वास के साथ अपनी बात रखते देखता हूँ, तो यही मेरे लिए सबसे बड़ी खुशी है।

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