संकलन एवं संपादन – पल्लवी शंभरकर
गंदे पानी से स्वच्छ विचारों की ओर… विद्यार्थियों का जल शुद्धीकरण प्रयोग!
– योगेश कांबळे

आसोला रियाजघर के विद्यार्थियों का अभिनव जल शुद्धीकरण प्रकल्प… विज्ञान केवल किताबों में लिखी हुई संकल्पनाएँ नहीं हैं, बल्कि अपने आसपास की दुनिया को देखने और समस्याओं का समाधान खोजने की एक दृष्टि है!
इसी विचार को कृती से जोड़ते हुए आसोला रियाजघर के विद्यार्थियों ने आसानी से उपलब्ध सामग्री की मदद से जल शुद्धीकरण का एक कार्यरत मॉडल तैयार किया। प्लास्टिक की बोतल, छोटे पत्थर, कंकड़, रेती, रेत, कोयला और रूई जैसी साधारण सामग्री का उपयोग करके विद्यार्थियों ने एक सरल लेकिन प्रभावी जल शुद्धीकरण यंत्र बनाया।
इसके बाद विद्यार्थियों ने गंदे पानी को इस मॉडल से गुजारकर पानी को छानने की प्रक्रिया का प्रत्यक्ष अनुभव लिया। इस प्रयोग के दौरान उन्होंने प्रत्येक परत की भूमिका को समझा। पानी में मौजूद अशुद्धियाँ अलग-अलग स्तरों पर किस तरह रुकती हैं, इसका निरीक्षण करते हुए उनके मन में कई सवाल पैदा हुए और उन सवालों के जवाब खोजने की उत्सुकता भी बढ़ी।
इस गतिविधि ने विद्यार्थियों को ‘करके सीखना’ इस अनुभव के माध्यम से विज्ञान को समझने का अवसर दिया। इसके साथ ही निरीक्षण, प्रयोगशीलता, तार्किक सोच, समस्या को हल करने की क्षमता, सहयोग और पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता जैसे कौशलों का भी विकास हुआ। किताबों में पढ़ा हुआ विज्ञान जब प्रत्यक्ष प्रयोग के रूप में सामने आया, तो विद्यार्थियों के लिए यह अनुभव और भी आनंददायी एवं अर्थपूर्ण बन गया।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि विद्यार्थियों ने यह समझा कि बड़ी समस्याओं को हल करने के लिए हमेशा बड़े साधनों की आवश्यकता नहीं होती। सही सोच, प्रयोग करने की इच्छा और उपलब्ध साधनों का रचनात्मक उपयोग करके भी प्रभावी समाधान खोजे जा सकते हैं। इस प्रयोग से विद्यार्थियों के मन में केवल विज्ञान की समझ ही विकसित नहीं हुई, बल्कि अपने आसपास की समस्याओं को पहचानकर उनके समाधान खोजने की सोच भी विकसित हुई।
इस प्रयोग से एक सुंदर संदेश मिला— “विज्ञान को सिर्फ पढ़ना नहीं होता, उसे अनुभव करना होता है; और समस्या को सिर्फ देखना नहीं होता, बल्कि उसका समाधान खोजना होता है!” आसोला रियाजघर के विद्यार्थियों का यह उपक्रम विज्ञान, पर्यावरण और रचनात्मकता का सुंदर संगम साबित हुआ।
दूध की गाड़ी से शुरू हुआ शिक्षा का सफर
– नविनता डोंगरे

चक्रीघाट बेड़े के बच्चों को इस साल नियमित रूप से स्कूल में दाखिल करने का निर्णय लिया गया, तो हमारे सामने कई चुनौतियाँ थीं। स्कूल और बेड़े के बीच काफी दूरी थी और रोज़ आने-जाने के लिए वाहन की व्यवस्था नहीं थी।
लेकिन बच्चों को स्कूल तक पहुँचाने और उनकी पढ़ाई शुरू कराने की इच्छा मजबूत थी। ऐसे समय में लाला भैया हमारे साथ खड़े हुए। स्कूल के लिए वाहन की व्यवस्था होने तक उन्होंने अपनी दूध की गाड़ी से बच्चों को रोज़ स्कूल पहुँचाने और वापस घर लाने की जिम्मेदारी उठाई। इसी तरह एक दूध की गाड़ी से इन बच्चों की शिक्षा का सफर शुरू हुआ।
शुरुआत में स्कूल के दरवाज़े पर खड़े बच्चों के मन में डर और झिझक थी। लेकिन रोज़ स्कूल जाने के साथ यह झिझक धीरे-धीरे कम होने लगी। कक्षा में बैठना, गाने गाना, शिक्षकों से बात करना और पढ़ाई में हिस्सा लेना उनके लिए नए अनुभव थे। धीरे-धीरे स्कूल उनके लिए अनजान जगह न रहकर अपनी-सी जगह बनने लगी और उनके चेहरे पर आत्मविश्वास दिखाई देने लगा।
इस बदलाव का असर बच्चों की रोज़मर्रा की जिंदगी में भी दिखने लगा। बच्चों ने खुद अपनी पढ़ाई की जिम्मेदारी लेना शुरू किया। बड़े भाई-बहन छोटे बच्चों को समझाने और घर पर पढ़ाने लगे और उसके बाद अपना होमवर्क भी पूरा करने लगे। शिक्षा अब सिर्फ स्कूल तक सीमित नहीं रही, बल्कि उनके दैनिक जीवन का हिस्सा बनने लगी। साथ ही, माता-पिता में भी बच्चों की शिक्षा को लेकर जागरूकता बढ़ने लगी।
इस बदलाव का सबसे बड़ा उदाहरण बच्चों की उपस्थिति है। शुरुआत में केवल 9 बच्चे स्कूल आते थे, लेकिन आज यह संख्या बढ़कर 16 बच्चों तक पहुँच गई है। जो बच्चे पहले स्कूल जाने के लिए तैयार नहीं होते थे, वे आज दूसरे बच्चों को खुशी से स्कूल जाते देखकर खुद भी स्कूल की राह पर चलने लगे हैं। एक बच्चे का बदलाव दूसरे बच्चे के लिए प्रेरणा बन रहा है और शिक्षा की यह श्रृंखला लगातार मजबूत हो रही है।
आज पीछे मुड़कर देखते हैं तो महसूस होता है कि सफर की शुरुआत भले ही दूध की गाड़ी से हुई थी, लेकिन असली बदलाव बच्चों के मन में आया है। स्कूल को लेकर झिझक अब अपनापन बन गई है, डर की जगह आत्मविश्वास ने ले ली है और उनकी आँखों में सीखने और आगे बढ़ने के सपने दिखाई देते हैं। लाला भैया का साथ, माता-पिता का विश्वास और बच्चों की सीखने की इच्छा ने इस बदलाव को संभव बनाया। दूध की गाड़ी सिर्फ बच्चों को स्कूल पहुँचाने का साधन नहीं थी; वह उनके उज्ज्वल भविष्य की ओर बढ़ने वाली पहली स्कूल बस थी।
नई शुरुआत, नया सफर और पढ़ने की पहली सीढ़ी
– देवेंद्र राऊत

सोनखांब बेड्यावर काम करने की मेरी शुरुआत एक नई दिशा और नए सफर की शुरुआत थी। नई जगह, नए बच्चे और उनकी सीखने की जरूरतों को समझते हुए मैं हर दिन उनके साथ समय बिताता था।
हर दिन एक नया अनुभव देता था और बच्चों के साथ काम करते हुए मुझे भी बहुत कुछ नया सीखने को मिल रहा था।
इसी दौरान मेरी मुलाकात पहली कक्षा में पढ़ने वाली दो प्यारी बच्चियों से हुई—जानवी और धुळी। शुरुआत में उन्हें बिना काना-मात्रा वाले सरल मराठी शब्द पढ़ने और लिखने में कठिनाई होती थी। अक्षरों को पहचानना, उन्हें जोड़कर शब्द बनाना और उन शब्दों को पढ़ना सीखने के लिए हम रोज़ थोड़ा-थोड़ा अभ्यास करते रहे। खेल, अलग-अलग गतिविधियों और पढ़ने के छोटे-छोटे अवसरों के माध्यम से उनका सीखने का सफर धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था।
कुछ दिनों बाद एक बहुत सुंदर पल आया… जानवी और धुळी खुद से मराठी शब्द पढ़ने लगीं और उन शब्दों को लिखने भी लगीं। उनके चेहरे की खुशी और “मैं यह कर सकती हूँ!” वाला आत्मविश्वास देखकर मन भर आया। यह केवल पढ़ने में आया बदलाव नहीं था, बल्कि खुद पर विश्वास करने के सफर की एक नई शुरुआत थी।
इस खुशी में और भी बढ़ोतरी तब हुई, जब Z.P. स्कूल के गोखे सर ने उनके पढ़ने की प्रशंसा की। बच्चियों की प्रगति देखकर उन्हें भी बहुत खुशी हुई। उस दिन एक बार फिर महसूस हुआ—बड़े बदलाव हमेशा छोटे-छोटे कदमों से ही शुरू होते हैं। बच्चों की प्रगति के पीछे उनका प्रयास, निरंतर अभ्यास और उन्हें मिलने वाला प्रोत्साहन बहुत महत्वपूर्ण होता है।
आज वे कुछ शब्द पढ़ रही हैं… कल वे पूरे वाक्य पढ़ेंगी, कहानियाँ पढ़ेंगी और शायद अपनी खुद की कहानियाँ भी लिखेंगी। यह तो बस शुरुआत है; आगे का सफर अभी और भी सुंदर और बड़ा है। उनके इन छोटे-छोटे कदमों के साथ उनके बड़े सपनों की ओर जाने वाला सफर भी शुरू हो चुका है।
यही है हमारी बिना दीवारों वाली पाठशाला…
– डेविड सूर्यवंशी

यह है हमारा नन्हा दिनेश… थोड़ा शरारती, लेकिन सीखने के लिए बहुत उत्सुक! इधर-उधर घूमते हुए, अपने आसपास की हर चीज़ से कुछ न कुछ नया सीखते रहना, जैसे उसकी आदत बन गई है। उसे कहाँ से और किस तरह अधिक सीखने को मिल सकता है, इसका वह हमेशा खोजता रहता है।
उसके चेहरे की खुशी, किसी चीज़ को जानने की इच्छा और सीखने की लगन हमेशा दिखाई देती है। 2025 में हमने जिस दिनेश को देखा था और आज के दिनेश में बहुत बड़ा बदलाव दिखाई देता है। अब वह बहुत-सी नई चीज़ों को अनुभव करता है, सीखता है और कहीं कोई दिक्कत आती है तो हमसे ज़रूर पूछता है। “सर, इसको क्या बोलते हैं?” उसका इतने प्यार से पूछा गया यह सवाल हमारे लिए बहुत खुशी का पल होता है। अब तो दिनेश खुद भी बताता है कि उसे क्या सीखना है। उसके मन में हमेशा एक ही धड़पड़ रहती है—“आज कुछ नया सीखने को मिलेगा क्या?”
पढ़ते समय वह दो अक्षरों वाले और आसान शब्द पढ़ लेता है। लेकिन उसके मन में एक अलग ही जिद है—“मुझे पढ़ना आना ही चाहिए!” यह लगन उसके हर प्रयास में दिखाई देती है। और आज तो वह सातवीं कक्षा की किताब पढ़ने की कोशिश कर रहा था! हमारा यह छोटा-सा, प्यारा दिनेश कक्षा में इधर-उधर देखता रहता है, लेकिन मैं क्या सिखा रहा हूँ, इस पर उसका पूरा ध्यान रहता है। मुझे हमेशा लगता है कि दिनेश को बहुत कुछ सीखना चाहिए, नई-नई चीज़ों का अनुभव करना चाहिए और उसकी जिज्ञासा को हमेशा एक नई दिशा मिलती रहनी चाहिए।
अब हितेश स्कूल जाता है और वह पहले से बहुत शांत हो गया है। वह मुझे बताता है, “सर, मेरे स्कूल में बहुत मारते हैं। मैं इधर तुम्हारे पास पढ़ता था, तो तुम नहीं मारते थे। सर, मुझे अभी पढ़ना आ रहा है।” तभी दिनेश भी बीच में कहता है, “सर, मुझे भी आ रहा है ना किशन जितना पढ़ना?” तब मैं हँसकर उससे कहता हूँ, “बहुत आ रहा है दिनेश, तेरेको पढ़ना!” मेरी यह बात सुनकर उसके चेहरे पर जो खुशी दिखाई देती है, वह देखने लायक होती है।
दिनेश को पढ़ाते समय मुझे सिर्फ उसका शिक्षक बनना नहीं, बल्कि उसका एक दोस्त बनकर उसे समझना ज्यादा अच्छा लगता है। क्योंकि उसके साथ पढ़ाते हुए मुझे भी उससे बहुत कुछ सीखने को मिलता है—उसकी जिज्ञासा, उसका उत्साह, उसकी मासूमियत और हर नई चीज़ जानने की उसकी लगन। हमारा दिनेश हँसते-खेलते सीखता है और सीखते-सीखते हमें भी बहुत कुछ सिखा जाता है।
चार दीवारें, बेंच, ब्लैकबोर्ड और एक निश्चित कक्षा न हो, फिर भी अगर सीखने की इच्छा हो तो हर जगह एक कक्षा बन सकती है और हर अनुभव एक नया सबक बन सकता है। यही तो है हमारी… “बिना दीवारों वाली पाठशाला!”
बेडे पर मेरा सफर — सिखाते-सिखाते सीखने का सफर
– दिपांशु देवासे

बेडा मेरे लिए नया था और वहाँ के बच्चे भी मेरे लिए नए थे। शुरुआत में बच्चों के मन में मेरे बारे में कई सवाल थे, और मेरे मन में भी यह विचार था कि उनके साथ कैसे जुड़ पाऊँगा और उन्हें कैसे समझ पाऊँगा।
इसलिए शुरुआती कुछ दिन थोड़े चुनौतीपूर्ण रहे। लेकिन धीरे-धीरे उनसे बातचीत करते हुए और उन्हें समझने की कोशिश करते हुए हमारे बीच एक जुड़ाव बनने लगा।
बेडे पर रोहित, कुलदीप और आशिष प्री-प्राइमरी के विद्यार्थी हैं, जबकि गोपाल, जयपाल, सेजल, राधा, भाऊ और रूपा प्राथमिक कक्षा के विद्यार्थी हैं। शुरुआत में इन बच्चों को पढ़ाई से बहुत ज्यादा परिचय नहीं था। उनके घर से स्कूल बहुत दूर होने के कारण नियमित रूप से स्कूल जाना भी संभव नहीं हो पाता था। इसलिए उनके लिए शिक्षा की एक अलग और आसान राह तैयार करना जरूरी था।
नियमित पढ़ाई शुरू करने के बाद बच्चों में पढ़ाई के प्रति उत्सुकता और सहभागिता धीरे-धीरे बढ़ती दिखाई देने लगी। बच्चे रुचि लेकर पढ़ने लगे और सीखते हुए उनमें आत्मविश्वास भी बढ़ने लगा। उनकी छोटी-छोटी प्रगति देखकर माता-पिता को भी खुशी होने लगी। बच्चों के चेहरों पर दिखाई देने वाली खुशी और सीखने की इच्छा मेरे लिए भी प्रेरणादायक बन गई।
शुरुआती कठिनाइयों के बाद धीरे-धीरे हर बच्चे के साथ मेरा एक अलग रिश्ता और बॉन्डिंग बन गई। पढ़ाई के साथ-साथ बातचीत, खेल और रोज़ के संवाद के माध्यम से बच्चे मेरे साथ जुड़ते गए। अब उनके साथ पढ़ाते समय मुझे सिर्फ एक शिक्षक होने का एहसास नहीं होता, बल्कि ऐसा लगता है जैसे मैं उनके साथ सीखने वाला एक दोस्त हूँ। उनके हर छोटे बदलाव से मुझे भी कुछ नया सीखने को मिलता है।
यह सफर अभी भी जारी है। हर महीने इन बच्चों के साथ कुछ नया सीखने, उनमें होने वाले बदलावों को अनुभव करने और उनके साथ एक नया रिश्ता जोड़ने का अवसर मिलता है। सिखाते हुए मैं उन्हें जितना सिखाता हूँ, उससे कहीं ज्यादा वे मुझे जिंदगी को देखने और समझने की कई बातें सिखाते हैं। आने वाले सफर में भी बच्चों के सीखने और उनकी प्रगति से जुड़ी कई सुंदर कहानियाँ देखने और अनुभव करने को मिलेंगी, ऐसी दिल से उम्मीद है।