फोटो बुलेटिन डिसेंबर 2025
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संकलन आणि संपादन  – निकिता देवासे

असोला – पढ़ने की लगन जगाने वाली यात्रा
– मिनानाथ दडमल

आज मैंने बेडे के कुछ बच्चों को नागपुर बुक्स एग्ज़िबिशन ले जाने का निर्णय लिया।

यह केवल एक यात्रा नहीं थी, बल्कि बच्चों के जीवन में पढ़ने के नए द्वार खोलने वाला एक अनुभव था।

इस यात्रा की शुरुआत बच्चों के घर जाकर हुई। मैंने हर बच्चे से पूछा, “क्या तुम नागपुर में होने वाली बुक्स एग्ज़िबिशन में जाना चाहते हो?”
यह सवाल सुनते ही उनकी आँखों में उत्साह चमक उठा। सभी ने एक साथ “हाँ!” कहा। लेकिन मुझे पता था कि सिर्फ बच्चों की तैयारी काफ़ी नहीं है; माता-पिता की अनुमति भी उतनी ही ज़रूरी थी।

कुछ माता-पिता शुरुआत में संकोच में थे। उनकी चिंता स्वाभाविक थी। मैंने उनसे शांति से बात की और समझाया कि इस कार्यक्रम से बच्चों को क्या मिलेगा, किताबों से उनका परिचय कैसे होगा और पढ़ने की रुचि कैसे बढ़ेगी। धीरे-धीरे उनके चेहरे से संकोच कम होने लगा। कुछ माता-पिता का जवाब बहुत ही सकारात्मक था। “बच्चों को घर से बाहर जाकर ऐसे अनुभव ज़रूर लेने चाहिए,” उन्होंने कहा। उनका विश्वास और सहयोग मेरे लिए बहुत खुशी देने वाला था।

फिर आज का दिन आ ही गया। हम सभी बुक्स एग्ज़िबिशन पहुँचे। चारों ओर किताबों के स्टॉल, रंग-बिरंगे कवर और पढ़ने का माहौल देखकर बच्चे बहुत खुश हो गए। स्टॉल पर घूमते समय कभी कोई बच्चा किताब हाथ में लेकर खुशी से कहता, “सर, यह किताब हमने पहले पढ़ी है!” उस गर्व भरी आवाज़ को सुनकर मन भर आता था।

बच्चों की इच्छा थी कि वे बहुत सारी किताबें खरीदें, लेकिन पैसों की सीमा थी। उन्होंने थोड़ी-सी किताबें ही खरीदीं, फिर भी उनकी आँखों में खुशी अपार थी। किताब हाथ में लेते ही जैसे उन्हें कोई ख़ज़ाना मिल गया हो। घर लौटने के बाद उन्होंने खरीदी हुई किताबें मुझे पढ़कर सुनाईं। पढ़ते समय उनकी आवाज़ में आत्मविश्वास था और चेहरे पर खुशी। उसी क्षण मुझे महसूस हुआ कि यह यात्रा सचमुच सार्थक रही।

यह दिन, यह अनुभव और बच्चों की आँखों में चमकती खुशी ये सब मेरे लिए हमेशा यादगार और बेहद अर्थपूर्ण बन गए।

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चक्रीघाट – एक निर्णय जो बच्चों के भविष्य को दिशा देता है

– कोमल गौतम

चक्रीघाट बेडे के लाला काका ने बच्चों की शिक्षा को लेकर एक दूरदर्शी और महत्वपूर्ण निर्णय लिया।

लगातार स्थानांतरण के कारण बच्चों की पढ़ाई में लगातार नहीं हो पा रही थी। हर साल अलग-अलग जगहों पर जाने से बच्चों को स्कूल और पढ़ाई में स्थिरता नहीं मिल पाती थी। यह समझते हुए लाला काका ने चांपा में एक ही जगह रुकने का फैसला किया, ताकि बच्चों की पढ़ाई नियमित रूप से चल सके और वे मुख्यधारा से जुड़ सकें।

चांपा गाँव से लगभग तीन से चार किलोमीटर दूर लाला काका ने अपना बेडा स्थिर किया। यहाँ हम दोनों फेलो नवनीता और मैं नियमित रूप से बच्चों को पढ़ाने जाते हैं। इस जगह हमें शिक्षा की एक नई शुरुआत करनी पड़ी। रोज़ बच्चों की कक्षाएँ लेना, उनके लिए नए उपक्रम करना और उनमें सीखने की रुचि जगाना यह सब यहाँ संभव हो पाया।

चक्रीघाट बेडे की तुलना में चांपा में बच्चे अधिक एकाग्र और सीखने में सक्रिय दिखाई दे रहे हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि बच्चों को यहाँ विशेष रूप से शिक्षा के उद्देश्य से रोका गया है। इससे उनके मन में यह भावना बन रही है कि “हम यहाँ पढ़ाई के लिए रुके हैं, तो हमें पढ़ना ही है।”

चक्रीघाट बेडे में रहते समय बच्चों की कक्षाएँ लेना हमारे लिए एक बड़ी चुनौती थी। कई बार बच्चे कक्षा में नहीं आ पाते थे या घरेलू कामों में व्यस्त रहते थे। ऐसे में शिक्षा की निरंतरता बनाए रखना मुश्किल हो जाता था। लेकिन चांपा में स्थिति पूरी तरह अलग दिखाई देती है।

हम जैसे ही बेडा पहुँचते हैं, बच्चे एक जगह इकट्ठा हो जाते हैं, अपने काम जल्दी निपटा लेते हैं और समय पर कक्षा में शामिल होते हैं। यह शिस्त और उत्साह बच्चों की शिक्षा में आए सकारात्मक बदलाव को दर्शाता है। उनकी सीखने की स्तर में भी स्पष्ट सुधार दिखाई दे रहा है।

इस प्रक्रिया में माता-पिता की सक्रिय भागीदारी भी देखने को मिलती है। लाला काका रात में बच्चों को गृहकार्य देते हैं, खासकर गणित के सवाल हल करवाते हैं और अगले दिन उनकी जाँच भी करते हैं। माता-पिता और शिक्षकों के इस संयुक्त प्रयास से बच्चों की पढ़ाई में निरंतरता, आत्मविश्वास और शिस्त विकसित हो रहा है।

चांपा में शुरू हुई यह शैक्षणिक यात्रा केवल बच्चों की पढ़ाई तक सीमित नहीं है, बल्कि उनके भविष्य को एक नई दिशा दे रही है। यह नई शुरुआत आशाजनक है और आने वाले समय में और भी सकारात्मक बदलाव लाएगी ऐसा विश्वास मन में बनता है।

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ठणठण – जिम्मेदारियों के बीच खिलती हुई शिक्षा

– पल्लवी शंभरकर

रिद्धी तेरह साल की है। उसका दिन काम से शुरू होता है और काम पर ही खत्म होता है।

सुबह आँख खुलते ही उसके सामने पढ़ाई की कॉपी नहीं होती, बल्कि जिम्मेदारियों की एक सूची होती है। घर के काम, जानवरों की देखभाल और छोटे भाई-बहनों का ध्यान रखना ये सब उसकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा हैं।

जिस समुदाय में वह रहती है, वहाँ किशोर उम्र की लड़कियों को पढ़ने की अनुमति नहीं दी जाती। शिक्षा को लड़कियों के लिए ज़रूरी नहीं माना जाता। उल्टा यह कहकर कि “अब जिम्मेदारी बढ़ गई है,” उन्हें घर की चारदीवारी में बाँध दिया जाता है। लड़कियों की ज़िंदगी बचपन से ही काम, कर्तव्य और जिम्मेदारियों से बंधी होती है। घर, गाय और बछड़े यही उनका रोज़ का संसार बन जाता है। पढ़ाई एक सपना होती है, लेकिन हकीकत कुछ और ही होती है।

रिद्धी रोज़ बछड़ों को चराने ले जाती है। धूप हो या बारिश, काम रुकता नहीं। समय उसका नहीं होता। उसका दिन उसकी इच्छा से नहीं, बल्कि काम की ज़रूरतों से चलता है। फिर भी इस लगातार चलने वाले काम के बीच वह थोड़ा-सा समय निकाल लेती है। यह समय उसने किसी से माँगा नहीं होता; यह समय उसने अपने लिए खुद हासिल किया होता है।

रिद्धी के लिए पढ़ाई किसी तय समय, तय जगह या तय घंटों तक सीमित नहीं है। मौका मिले तो जहाँ मिले, वहीं वह सीखती है। जब वह बछड़ों को चराते समय मुझे देखती है, तो उसके चेहरे पर एक अलग-सी चमक आ जाती है। वह बछड़ों को एक जगह रोकती है, पास रखी कॉपी-किताब निकालती है और पंद्रह-बीस मिनट में जितना हो सके उतना सीखती है। बीच-बीच में बछड़ों पर नज़र रखती है और फिर वापस किताब की ओर लौट जाती है। उसकी नज़र कभी किताब पर होती है, कभी जिम्मेदारियों पर लेकिन दोनों को संभालने की उसकी कोशिश लगातार चलती रहती है।

वह यह अच्छी तरह जानती है कि अगर आज नहीं पढ़ी, तो कल फिर वही काम होंगे। समय नहीं रुकेगा, लेकिन अगर उसने सीखना रोक दिया, तो उसका सपना पीछे छूट जाएगा। रिद्धी को किसी ने ज़बरदस्ती पढ़ने नहीं बैठाया है। किसी ने उसे यह नहीं कहा कि “तुम्हें पढ़ना ही है।” फिर भी सीखने की उसकी इच्छा बहुत गहराई से जमी हुई है। यह भीतर से आती है अपने लिए कुछ करने की, खुद को बदलने की इच्छा है।

आज रिद्धी A, E, I, O, U सभी स्वरों वाले CVC शब्द पढ़ और पहचान सकती है। cat, bat, pen, sit, top, run जैसे शब्द उसने स्कूल की कक्षा में बैठकर नहीं, बल्कि काम के बीच मिले उन पंद्रह-बीस मिनटों में सीखे हैं। ये शब्द देखने में छोटे हैं, लेकिन उसके लिए आत्मविश्वास का एक बड़ा कदम हैं। हर शब्द के साथ उसका आत्मविश्वास थोड़ा बढ़ता है और उसका सपना थोड़ा और करीब आता है।

यह कहानी सिर्फ रिद्धी की नहीं है। आज भी कई रिद्धियाँ काम के बोझ के नीचे सीखने की छोटी-छोटी खिड़कियाँ ढूँढ रही हैं। मौका मिले, थोड़ा-सा साथ मिले, तो किसी भी परिस्थिति में सीखना संभव है यह बात रिद्धी हर दिन, चुपचाप लेकिन मजबूती से साबित करती है।

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सोनखांब – अभिभावक सभा

– प्रीतम नेहारे

साल खत्म होने की ओर बढ़ रहा है और बदलाव हो रहे हैं। कितना काम हुआ, क्या-क्या हुआ यह सब हर कोई देखता है; लेकिन माता-पिता के लिए यह तय करना कि उनके बच्चों को क्या आना चाहिए और क्या नहीं, वास्तव में बहुत कठिन होता है।

अब तक मैंने कई अभिभावक सभाएँ ली हैं, लेकिन यह सभा मेरे लिए कुछ अलग और बेहद अर्थपूर्ण रही।

इस सभा में मैंने माता-पिता से पूछा कि पिछले दो महीनों में उन्होंने अपने बच्चों में कौन-से अच्छे बदलाव देखे हैं। जवाब भले ही थोड़े टूटे-फूटे थे, लेकिन वे बहुत कुछ सिखाने वाले थे। छोटे बच्चों में हो रहे बदलाव साफ दिखाई दे रहे थे। बच्चे अब लिखने और पढ़ने लगे हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि केवल डेढ़ साल के बच्चे भी स्कूल आकर ठीक से बैठते हैं, खेलते हैं और वातावरण के साथ तालमेल बिठा लेते हैं। यह काम करते हुए कई साल हो गए हैं। जुलाई से शुरू हुई यह यात्रा अब कहीं आकर रुकने वाली है ऐसा एहसास पिछले कुछ दिनों से होने लगा है। यहाँ सीखी गई हर बात याद आ रही है। हर पल और भी यादगार लगता जा रहा है।

करीब डेढ़ घंटे तक अभिभावक सभा चली। तभी एक दीदी ने तुरंत कहा, “भैया, क्या आपको हम पर भरोसा नहीं है?” मैंने उनसे कहा, “नहीं दीदी, ऐसा नहीं है। लेकिन जो काम हम कर रहे हैं, उसके बारे में सबको जानकारी होना ज़रूरी है। और आपको मुझसे सवाल पूछने ही चाहिए। सवाल पूछने से ही काम में गति आती है और वह ज़्यादा प्रभावी बनता है।”

लेकिन माता-पिता यहीं नहीं रुके। उन्होंने कहा, “भैया, हमारे बच्चों को सब कुछ पढ़ना आना चाहिए, लिखना आना चाहिए। बच्चे झगड़ा नहीं करें।”
मैंने उन्हें समझाया, “दीदी, हम बच्चों को ऐसा माहौल देते हैं जहाँ वे अपनी ज़रूरतों को समझना सीखते हैं। अगर उन्हें कोई चीज़ चाहिए, तो वे माँगते हैं, कभी-कभी झगड़ते भी हैं। यह उनके शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक विकास का ही हिस्सा है।” इस पर उन्होंने कहा, “हाँ भैया, लेकिन हमारी बात समझने की आदत तो होनी चाहिए।” माता-पिता की अपेक्षाएँ यहीं खत्म नहीं होतीं; वे धीरे-धीरे बढ़ती जाती हैं।

माता-पिता ने बच्चों की कॉपियाँ भी देखीं। जानवी, जो पहले लिखने से कतराती थी, अब लिखने लगी है। धुली, विशाल जैसे बच्चे, जो पहले सिर्फ अक्षर पढ़ पाते थे, अब मात्राएँ भी पढ़ने लगे हैं। एक बात को लेकर शिकायत भी आई थी। लेकिन जानवी ने पहले ही मुझसे कह दिया था, “भैया, आज मैंने मोबाइल देखा, पढ़ाई नहीं की।” सभा खत्म होने के बाद जानवी की माँ मुझसे बोलीं, “भैया, मेरी बेटी कुछ नहीं करती, ज़रा समझाइए।” मैंने उन्हें कहा, “दीदी, यह बात जानवी ने मुझे पहले ही बता दी थी।”

ऐसे मज़ेदार और दिलचस्प पलों के बीच यह यात्रा आगे बढ़ रही है। यह साफ महसूस हो रहा था कि माता-पिता अब ज़्यादा सजग हो गए हैं। इस सभा में अपनापन, प्यार और चिंता सबका अनुभव हुआ। साल आगे बढ़ रहा है और मन में यह भावना आ रही है कि यह यात्रा कहीं आकर विराम लेने वाली है। बच्चों के साथ मेरा जुड़ाव बढ़ता जा रहा है और मैं भी धीरे-धीरे उनका हिस्सा बनता जा रहा हूँ। इन सब बातों को समझने के लिए शायद एक साल भी कम पड़ जाए यह सीख मुझे यहाँ मिल रही है।

अनजाने में ही हम उनके जीवन का हिस्सा बन गए हैं। बहुत काम किया, उतनी ही मुश्किलें भी झेली। लेकिन यह सफ़र अभी पूरा नहीं हुआ है। अभी कई और किस्से, कई और अनुभव बाकी हैं।

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