— जीवन ढोक

मैं एक फेलो टीचर के रूप में असोला बेडा पर काम कर रहा हूँ। मेरा उद्देश्य इन लोगों के माइग्रेशन को समझना और वे जहाँ रहते हैं उन जगहों की लोकेशन की जानकारी प्राप्त करना है। इसी कारण मैंने बेडा मैपिंग की यात्रा शुरू की।
यह सफर बिल्कुल आसान नहीं था। शुरुआत में मुझे बहुत कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। कभी मुझे जंगलों से होकर जाना पड़ा, कभी नालों से गाड़ी निकालनी पड़ी, तो कभी नदी के किनारे सफर करना पड़ा। कई बार मैं गायों के साथ जंगल तक भी गया।रास्ते में किसान मुझे बताते थे कि जंगल में बाघ हैं, इसलिए सावधान रहना चाहिए। फिर भी मैं बिना डरे आगे बढ़ता रहा।
कभी तेज धूप में लंबा सफर करके मैं बच्चों तक पहुँचता था। सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि बच्चों को कैसे पढ़ाया जाए, क्योंकि वहाँ कोई स्कूल नहीं था। लेकिन मैंने हार नहीं मानी। मैंने पेड़ के नीचे, वाहन की छाया में और कभी मंदिर के पास बच्चों को पढ़ाना शुरू किया।
इस अनुभव से मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला। मैंने समझा कि भरवाड़ समुदाय किन-किन क्षेत्रों में जाता है, किन जिलों में माइग्रेट करता है और किन जगहों पर कुछ समय के लिए रुकता है। साथ ही मैंने यह भी करीब से देखा कि बच्चे माइग्रेशन के दौरान कैसे पढ़ाई करते हैं और साथ ही काम भी संभालते हैं।
मैंने इन सभी जगहों का मैपिंग करके एक नक्शा तैयार किया। इस पूरी प्रक्रिया ने मुझे सिर्फ शिक्षा देने का अनुभव ही नहीं दिया, बल्कि जीवन को समझने की एक नई दृष्टि भी दी।
आखिर में मुझे एक बात समझ आई — कोई भी सीख कभी व्यर्थ नहीं जाती। अनुभव से मिली शिक्षा हमें जीवन में बहुत आगे लेकर जाती है।.