ठणठण – माइग्रेशन के साथ शिक्षा की आशा
ठणठण – माइग्रेशन के साथ शिक्षा की आशा

ठणठण – माइग्रेशन के साथ शिक्षा की आशा

डेविड सूर्यवंशी

मैं और प्रगति सुबह बेडा पर पहुँचे, तो देखा कि रेखा दीदी और विभा भैय्या अपनी गाड़ी में सारा सामान भर रहे थे। हम दोनों सोचने लगे कि वे इतनी जल्दी बाहर क्यों जा रहे हैं।

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तब विभा भैय्या और रेखा दीदी ने बताया कि कळमना बेडा में गायों के चारे की बहुत समस्या हो रही थी। विभा भैय्या ने बताया कि वहाँ रोज गायों के चारे पर लगभग सात हजार रुपये खर्च हो रहे थे। साथ ही अब पहले की तरह ज्यादा दूध भी नहीं मिल रहा था। इसलिए उन्हें अपने छोटे बच्चों को साथ लेकर दूसरी जगह जाना पड़ रहा था।

वहाँ किसन और पुडू भी थे। किसन हमें बता रहा था कि, “अब हम कुही गाँव में आ गए हैं।” उसकी माँ ने बताया कि अब किसन हर गाँव का नाम पढ़ लेता है। वह अंग्रेज़ी में गाँवों के नाम पढ़ता है और फिर हमें बताता है, “इस गाँव का नाम यह है।” वह अपनी माँ और बेडा के लोगों को भी पढ़े हुए नाम बताता रहता है।

पहले शांत और शर्मीला लगने वाला किसन अब आत्मविश्वास के साथ बात करने लगा है। उसे अब थोड़ा-बहुत पढ़ना और लिखना भी आने लगा है। इससे उसके माता-पिता को भी शिक्षा का महत्व समझ में आने लगा है। रेखा दीदी कह रही थीं,
“अब हम अपने बच्चों को जरूर पढ़ाएंगे। हम किसन को स्कूल भेजने के बारे में सोच रहे हैं।”

उनकी ये बातें सुनकर हमें बहुत संतोष हुआ। लगातार एक जगह से दूसरी जगह जाने वाले इन परिवारों के जीवन में कई कठिनाइयाँ हैं, लेकिन फिर भी अपने बच्चों को पढ़ाने और आगे बढ़ाने की उनकी इच्छा बहुत प्रेरणादायक लगी।

इस तरह हमारी यह बेडा विज़िट हमारे लिए बहुत खास बन गई। इस मुलाकात

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