— कोमल गौतम

आज जब मैं रणूभाई के बेडा पर गई, तो उन्होंने मुझे देखते ही मुस्कुराते हुए कहा,
“दीदी, आप बहुत दिनों के बाद आये… हमें भी अच्छा लगता है जब आप आते हो। क्योंकि हमारे यहाँ आप जैसे बाहर के लोग नहीं रुकते। जो दीदी बच्चों को पढ़ाने आती हैं, वही दीदी हमारे यहाँ रुकती हैं।”
उनकी ये बातें सुनकर मेरा मन भावुक हो गया। उनके शब्दों में अपनापन और प्यार साफ महसूस हो रहा था। चक्रीघाट से यह बेडा स्थलांतरित होने के बाद हम यहाँ नहीं आ पाए थे। यहाँ केवल एक ही बच्चा था और कुछ अन्य कारणों से यहाँ आना संभव नहीं हो पा रहा था। फिर भी रणूभैया हमेशा आग्रह से कहते थे, “दीदी, आप एक बार बेडे पे जरूर आना।” उनका वह आग्रह और मेरे मन की इच्छा आज आखिर पूरी हो गई।
आज जब मैं इस बेडा पर पहुँची, तो वहाँ पहुँचते ही एक अलग शांति और अपनापन महसूस हुआ। दीदी के साथ उनकी रोजमर्रा की जिंदगी, बच्चों और यहाँ की परिस्थितियों के बारे में बहुत सारी बातें हुईं। बेडा पर रहने वाले भैय्यों के साथ भी कई विषयों पर खुलकर बातचीत हुई। उनके जीवन, संघर्षों और उम्मीदों के बारे में सुनते हुए मुझे बहुत कुछ समझने को मिला। बातों-बातों में मैंने उन्हें बताया कि अब मेरी fellowship समाप्त हो गई है। यह सुनकर उन्होंने बहुत प्यार और अपनत्व से कहा,
“ये आपका ही घर है दीदी… आप कभी भी यहाँ आने के लिए ज्यादा सोचना मत।” उनके ये शब्द मेरे दिल को छू गए। उस एक वाक्य में इतना प्यार, अपनापन और विश्वास था कि कुछ पल के लिए मैं शब्दहीन हो गई।
आज का यह अनुभव सिर्फ एक मुलाकात नहीं था, बल्कि एक रिश्ते को फिर से महसूस करने का पल था। इस मुलाकात से मुझे एहसास हुआ कि जहाँ हम प्यार और सच्चे मन से काम करते हैं, वहाँ हमारा एक घर बन जाता है। और वहाँ के लोग अपने बन जाते हैं। आज का दिन मेरे लिए बहुत खास और हमेशा याद रहने वाला है।.