फोटो बुलेटिन – मार्च 2026
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संकलन और संपादन – निकिता देवासे

सोनखांब – मयूर, धूली और जानवी की बढ़ती प्रगति

– प्रीतम नेहरे

शिक्षा के सफर में हर बच्चे की गति अलग होती है। कुछ बच्चों को बातें जल्दी समझ में आती हैं, तो कुछ को थोड़ा समय लगता है। लेकिन सही समय, निरंतरता और मार्गदर्शन मिले तो हर बच्चे में सकारात्मक बदलाव आ सकता है।

मयूर को पिछले साल से मात्रा और अक्षरों का अभ्यास करना कठिन लग रहा था। वह बहुत चंचल है, इसलिए उसका ध्यान एक जगह लगाना और पढ़ाई करना उसके लिए मुश्किल था। माता-पिता और स्कूल के शिक्षक उससे लगातार बात कर रहे थे, लेकिन अपेक्षित परिणाम नहीं मिल रहा था। फिर भी वह दिया गया अभ्यास ईमानदारी से करता था, बस उसे समझने में थोड़ा अधिक समय लगता था। लगातार प्रयास और मार्गदर्शन के कारण अब स्थिति में सकारात्मक बदलाव दिख रहा है। मयूर अब मात्रा पढ़ने लगा है और उसे गणित की बुनियादी अवधारणाएँ भी समझ में आने लगी हैं।

धूळी जिस तरीके से सीख रही है, उसी तरह उसका विकास भी हो रहा है। शुरुआत में उसे कुछ बातें समझने में समय लगता था, लेकिन अब उसका आत्मविश्वास बढ़ता हुआ दिखाई देता है। फिलहाल वह मात्रा पढ़ना अच्छे से कर लेती है। गणित में भी वह जोड़ और घटाव सही तरीके से हल कर सकती है। उसके सीखने में आया यह बदलाव उसकी मेहनत और नियमित अभ्यास का परिणाम है।

जानवी को शुरुआत में लिखना नहीं आता था और अक्षरों की पहचान भी सीमित थी, जिससे उसके लिए सीखना और कठिन हो गया था। लेकिन अभ्यास और सही मार्गदर्शन मिलने से अब उसमें काफी बदलाव आया है। अब वह अक्षरों और अंकों को पहचानने लगी है और शब्द तथा पहाड़े पढ़ सकती है। उसकी प्रगति पहले की तुलना में काफी बढ़ी है। आज उसके पिता भी खुशी से बताते हैं कि वह अब खुद लिखने लगी है, जो उसकी प्रगति का एक बड़ा संकेत है।

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ठनठन – Zero Gravity – आनंद की यात्रा

– मयूर गेडाम

भरवाड़ समुदाय के बच्चों के लिए घर के काम छोड़कर बाहर जाना थोड़ा मुश्किल होता है। इसलिए उन्हें घर से बाहर निकलने और नई जगहों पर जाने के अवसर बहुत कम मिलते हैं।

उनका अधिकतर समय अपने परिवार के साथ, अपने ही परिचित वातावरण में बीतता है। बच्चों से बातचीत करते समय कई बार महसूस होता है कि उनके सपनों की भी एक सीमा है, क्योंकि उन्होंने अभी तक बड़ी दुनिया देखी ही नहीं है। मुझे विश्वास था कि अगर उन्हें भी ऐसे अलग वातावरण का अनुभव मिलेगा, तो उनके विचारों में जरूर बदलाव आएगा।

जब मुझे Zero Gravity इस पहल के बारे में पता चला, तो मैंने तय किया कि हमें अपने बच्चों को वहाँ जरूर ले जाना है। यह निर्णय लेते समय उत्साह तो था, लेकिन इसके साथ कई जिम्मेदारियाँ और चुनौतियाँ भी थीं। सबसे बड़ी चुनौती थी माता-पिता को तैयार करना, क्योंकि यहा रात में जाना था।

मैंने एक-एक करके माता-पिता से बात करना शुरू किया। कुछ माता-पिता के मन में डर था—“बच्चे इतनी दूर कैसे जाएंगे?”, “उनकी देखभाल कौन करेगा?”, “अगर कोई परेशानी हुई तो?”—ऐसे कई सवाल उन्हें चिंतित कर रहे थे। शुरुआत में कुछ माता-पिता ने साफ मना कर दिया। लेकिन मैंने उन्हें शांति से समझाया और उनका विश्वास जीतने की कोशिश की। मैंने उन्हें भरोसा दिलाया कि उनके बच्चों की पूरी जिम्मेदारी हम लेंगे।

दो-तीन बार बात करने के बाद धीरे-धीरे उनका डर कम होने लगा और विश्वास बढ़ने लगा। कुछ माता-पिता ने सहमति दी और वहीं से इस यात्रा की शुरुआत हुई। उस दिन बच्चों में एक अलग ही उत्साह देखने को मिला। कुछ बच्चे पहली बार इतनी दूर जा रहे थे, इसलिए उनके चेहरे पर खुशी के साथ थोड़ा डर भी था। फिर भी वे बहुत उत्साहित थे। सफर के दौरान वे लगातार नई चीजें देख रहे थे, सवाल पूछ रहे थे और हर पल का आनंद ले रहे थे।

जब बच्चे Zero Gravity पहुँचे, तो वहाँ का माहौल, विभिन्न गतिविधियाँ और खेल, यह सब उनके लिए बिल्कुल नया था। शुरुआत में कुछ बच्चे थोड़े डरे हुए थे, लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने खुद को उस वातावरण के साथ ढाल लिया।

कुछ ही समय में उन्होंने अपना डर भूलकर दिल से खेलना और हँसना शुरू कर दिया। उनके चेहरों की खुशी और उनकी हँसी देखकर ऐसा लग रहा था कि यह अनुभव उनके जीवन का एक खास पल बन रहा है।

उस दिन उन्होंने सिर्फ खेल और गतिविधियाँ ही नहीं कीं, बल्कि एक नई दुनिया का अनुभव किया, जो उनके रोजमर्रा के जीवन से बिल्कुल अलग थी।

उस दिन ने मुझे एक महत्वपूर्ण बात सिखाई बच्चों को सपने देखने का मौका देना चाहिए, और उन सपनों को पूरा करने के लिए किसी का उनके साथ खड़ा होना बहुत जरूरी है। सही अवसर और थोड़ी सी मदद मिले, तो यही बच्चे बड़े सपने देख सकते हैं और उन्हें पूरा भी कर सकते हैं।

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असोला – बच्चों के साथ सुंदर पल

– प्राची बोरेकर

आज हम माइग्रेशन बेडे पर बच्चों से मिलने गए थे। बहुत दिनों बाद उन्हें देखने और मिलने का मौका मिला, इसलिए मन में एक अलग ही उत्सुकता और खुशी थी।

रास्ता ठीक से पता नहीं था, फिर भी लोगों से पूछते और ढूंढते हुए आखिर हम अपने बच्चों तक पहुँच ही गए। वहाँ तक पहुँचने का वह सफर भी बहुत खास लगा, क्योंकि हर कदम के साथ उनसे मिलने की चाह और बढ़ती जा रही थी।

हमें देखकर शुरुआत में बच्चे थोड़े झिझक रहे थे। वे थोड़ी दूरी पर खड़े होकर हमें देख रहे थे, जैसे उन्हें अभी भी यकीन नहीं हो रहा था कि हम सच में उनसे मिलने आए हैं। शीतल तो पहले हमारे पास आई ही नहीं। वह अभी बहुत छोटी है, सिर्फ तीन साल की। उसके चेहरे पर थोड़ा डर भी दिखाई दे रहा था। लेकिन हमने उससे धीरे-धीरे बात की, हँसे, उसे अपनापन महसूस कराया… और थोड़ी ही देर में वह भी मुस्कुराते हुए हमारे पास आ गई।

फिर तो पूरा माहौल ही बदल गया। सभी बच्चों ने मिलकर खूब खेला, बातें कीं, हँसे और दिल खोलकर मस्ती की। उनके चेहरों की खुशी बहुत कुछ कह रही थी। उन छोटे-छोटे पलों में एक अलग ही अपनापन महसूस हो रहा था, जैसे हम कभी उनसे दूर थे ही नहीं।

हम उन्हें देखकर जितने खुश हुए, उतने ही वे भी हमें देखकर खुश थे। उनकी उस मासूम खुशी ने हमारा दिल भर दिया। उन पलों में समय कैसे बीत गया, पता ही नहीं चला। लेकिन जब वापस आने का समय हुआ, तो मन बिल्कुल तैयार नहीं था। ऐसा लग रहा था कि थोड़ा और समय वहीं रुक जाएँ, थोड़ा और खेलें, थोड़ी और बातें करें… क्योंकि वह समय बहुत कीमती लग रहा था।

आज की इस मुलाकात से एक बहुत महत्वपूर्ण बात सीखने को मिली कभी-कभी किसी को बड़ी चीजों की जरूरत नहीं होती। सिर्फ थोड़ा सा समय, थोड़ा ध्यान और थोड़ा सा प्यार भी बहुत आनंद दे सकता है।

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चक्रिघाट – अंगूठे से हस्ताक्षर तक

– नविनिता डोंगरे

आज हम हमेशा की तरह गाँव के बाहर भरवाड़ बस्ती में गए थे। सूरज बहुत तेज़ था, चारों तरफ़ गर्मी महसूस हो रही थी और खुली जगह पर बैठना मुश्किल हो रहा था।

इसलिए हम बच्चों का क्लास लेने के लिए छाया ढूँढ रहे थे। काफी देर खोजने के बाद एक बड़े पेड़ के नीचे थोड़ी ठंडक मिली और वहीं हमने बच्चों को पढ़ाना शुरू किया।

तभी वहाँ एक पोस्टमैन अंकल आए। उनके हाथ में एक पार्सल था, जो एक बच्चे के पिता के लिए दवाई का था। पोस्टमैन ने पूछा, “इस पर साइन कौन करेगा?”

सभी बड़े लोग एक-दूसरे की ओर देखने लगे। हमेशा की तरह अंगूठा लगाने की ही आदत थी।

लेकिन इस बार कुछ अलग हुआ।

सवा धीरे से खड़ा हुआ।
उसने पोस्टमैन से पेन लिया… थोड़ी देर कागज़ को देखा… और फिर उसने अपना नाम लिख दिया।

थोड़ा टेढ़ा-मेढ़ा था… लेकिन वह उसकी पहली साइन थी।

उस पल उसके चेहरे पर जो खुशी थी, उसे शब्दों में बयां करना मुश्किल है। उसकी आँखों में आत्मविश्वास झलक रहा था “मैं भी कर सकता हूँ” यह विश्वास।

आसपास बैठे सभी लोगों की आँखों में गर्व था। उसके पिता के चेहरे पर भी एक अलग ही संतोष दिखाई दे रहा था। उस छोटी सी साइन ने एक बड़ा बदलाव ला दिया था।

उस छोटी सी साइन में सिर्फ उसका नाम नहीं था, बल्कि उसका आत्मविश्वास भी था। अंगूठे से साइन तक का यह सफर सिर्फ एक बच्चे का नहीं, बल्कि यह एक जीता-जागता उदाहरण है कि शिक्षा किस तरह बदलाव ला सकती है।

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