संकलन और संपादन – निकिता देवासे
चक्रीघाट – बच्चों को मिली सीखने की नई राह
– कोमल गौतम

चक्रीघाट बेडे के स्थानांतरण के बाद कुछ परिवार चांपा गांव के पास आकर रहने लगे हैं।
उनमें से कुछ बच्चे अपने परिवार के साथ चांपा में रह रहे हैं, जबकि कुछ बच्चे अभी भी अपने माता-पिता के साथ स्थानांतरित हो रहे हैं।
चांपा गांव में बच्चों को नियमित रूप से पढ़ाना शुरू करने के बाद उनके व्यवहार और सीखने में सकारात्मक बदलाव दिखाई देने लगा है। बच्चे अब नियमित रूप से कक्षा में बैठते हैं, ध्यान से पढ़ते हैं और दिए गए काम को करने की कोशिश करते हैं। धीरे-धीरे उनका आत्मविश्वास भी बढ़ता हुआ दिखाई दे रहा है।लेकिन जो बच्चे अभी भी अपने माता-पिता के साथ स्थानांतरित बेडो में रह रहे हैं, उनमें ऐसा बदलाव दिखाई नहीं दे रहा है।
सव्वा इस समय अपने दादा-दादी के साथ चांपा में रह रहा है, जबकि उसका छोटा भाई जगदीश अभी भी अपने माता-पिता के साथ स्थानांतरित बेडे पर रहता है। पहले सव्वा पढ़ाई में रुचि नहीं लेता था और कक्षा में भी ठीक से नहीं बैठता था, लेकिन अब उसमें काफी बदलाव दिखाई दे रहा है।
वह नियमित रूप से कक्षा में बैठता है, ध्यान से पढ़ता है और खुद से पढ़ाई करने की कोशिश करता है। शनिवार-रविवार की छुट्टी में जब उसके पिता उसे अपने साथ बेडे पर ले जाते हैं, तब वह वहां दूध का हिसाब करते हुए भी दिखाई देता है। इससे उसके माता-पिता को भी शिक्षा का महत्व समझ में आने लगा है।
जगदीश के मामले में भी कुछ ऐसा ही हुआ। उसे चांपा में पढ़ने के लिए भेजने के लिए हम उसकी मां से बार-बार बात कर रहे थे, लेकिन शुरुआत में उन्होंने उसे स्कूल नहीं भेजा। बाद में जब हम उनकी स्थानांतरित बेडे पर गए, तो हमने उनसे सीधे बातचीत की और समझाया कि अगर जगदीश को शिक्षा का अवसर नहीं मिला, तो उसका कितना नुकसान हो सकता है।
इस बातचीत के बाद अगले ही दिन उन्होंने जगदीश को पढ़ने के लिए चांपा भेज दिया। अब उसे भी पढ़ने का मौका मिल रहा है। आगे उसमें भी सकारात्मक बदलाव देखने को मिलेंगे, ऐसी आशा है।
असोला – फिर से सीखने की नई शुरुआत
– जीवन ढोक

किसन दसवीं कक्षा में पढ़ रहा है, लेकिन घर की कुछ जिम्मेदारियों के कारण पिछले दो वर्षों से वह नियमित रूप से स्कूल नहीं जा पा रहा था।
इसके कारण उसकी पढ़ाई काफी पीछे रह गई थी। स्कूल में नियमित उपस्थिति न होने से उसे पढ़ाई की कई बातें समझ में नहीं आती थीं। शुरुआत में उसे दसवीं की परीक्षा को लेकर डर लगता था और आगे क्या करना है, इसे लेकर वह उलझन में था। क्या वह परीक्षा दे पाएगा, क्या वह सफल हो पाएगा ऐसे कई सवाल उसके मन में डर पैदा कर रहे थे।
लेकिन लगातार संवाद करते हुए उसे धीरे-धीरे समझाया गया कि अगर वह प्रयास करे और थोड़ी मेहनत करे, तो वह निश्चित रूप से सफल हो सकता है। उसका आत्मविश्वास बढ़ाने की कोशिश की गई। इसके बाद उसे रोज़ स्कूल जाने के लिए प्रोत्साहित किया और नियमित रूप से पढ़ाई करने के लिए प्रेरित किया गया। धीरे-धीरे उसने भी पढ़ाई पर ध्यान देना शुरू किया और परीक्षा में बैठने का निर्णय लिया।
वह स्कूल में नियमित नहीं जाता था, लेकिन मेरे द्वारा बेडे पर लिए गए क्लास में वह अक्सर उपस्थित रहता था। उस क्लास में मैंने उसे मराठी, हिंदी और अंग्रेज़ी विषयों की किताबें पढ़ने और व्यावहारिक गणित के प्रश्न हल करने के लिए दिए। साथ ही, हर विषय के पिछले कुछ वर्षों के प्रश्नपत्र भी उसे हल करने के लिए दिए। मैं खुद उसके पास बैठकर उसे समझाता था और उससे उन प्रश्नों का अभ्यास करवाता था। उसे छोटे-छोटे लक्ष्य दिए जाते थे और उन्हें पूरा करने पर उसकी सराहना की जाती थी, जिससे उसे आगे बढ़ने के लिए प्रेरणा मिलती थी।
आज वह आत्मविश्वास के साथ दसवीं की परीक्षा दे रहा है। “सर, आप पढ़ाते हैं इसलिए मुझे अब थोड़ा समझ में आने लगा है,” ऐसा उसने कहा। दो साल तक स्कूल न जाने के कारण शुरुआत में उसे कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, लेकिन अब वह धीरे-धीरे पढ़ाई में रुचि लेने लगा है। खासकर मराठी पढ़ने और समझने में उसकी प्रगति दिखाई दे रही है। अब वह अधिक ध्यान से सुनता है, पढ़ने की कोशिश करता है और समझने का प्रयास करता है।
किसन का यह सफर वास्तव में प्रेरणादायक है। सही मार्गदर्शन, निरंतरता और प्रोत्साहन मिलने पर विद्यार्थी फिर से सीखने की राह पर लौट सकते हैं यह इसका एक बेहतरीन उदाहरण है। यदि विद्यार्थियों पर विश्वास किया जाए और उन्हें सहयोग दिया जाए, तो उनमें आत्मविश्वास विकसित किया जा सकता है।
आने वाले दिनों में भी किसन और अन्य बच्चों को इसी तरह मार्गदर्शन देकर उनके सीखने के सफर को और मजबूत करने का प्रयास किया जाएगा, ताकि वे भी शिक्षा के माध्यम से आगे बढ़ सकें।
ठणठण – पेड़ के नीचे कक्षा – सीखने का नया अनुभव
– प्रगति बांडेबूचे

ठणठण से बेडे स्थानांतरित होने के बाद वह कळमना गाँव के पास जाकर बस गए है।
वहाँ बच्चों को पढ़ाने के लिए हमारे पास न तो नियमित कक्षा थी और न ही पर्याप्त संसाधन उपलब्ध थे। लेकिन बच्चों की पढ़ाई रुकनी नहीं चाहिए, इसलिए हमने पेड़ के नीचे ही एक ओपन क्लासरूम शुरू की।
पेड़ की छाया में बच्चों को बैठाकर पढ़ाते समय हमने सोचा कि इस कक्षा को और आकर्षक कैसे बनाया जा सकता है। इसके लिए हमने पेड़ों पर अलग-अलग शब्द कार्ड, चित्र और शैक्षणिक पोस्टर लगाए। पेड़ ही हमारे लिए दीवार और ब्लैकबोर्ड जैसा बन गया और उसके माध्यम से बच्चों के लिए एक अलग तरह का सीखने का माहौल तैयार हुआ।
इस गतिविधि में बच्चों को पेड़ पर लगाए गए शब्द पढ़ने, उन्हें ढूंढने और उन शब्दों से नए शब्द बनाने के लिए कहा गया। कई बार बच्चों को उन शब्दों से छोटे-छोटे वाक्य बनाने के लिए भी प्रेरित किया गया। इस तरह बच्चों ने खेल-खेल में पढ़ने का अभ्यास शुरू किया।
इस प्रक्रिया में बच्चों का उत्साह काफी बढ़ गया। उन्हें इस नई तरीके से सीखना बहुत पसंद आया। वे खुद पेड़ के पास जाकर शब्द पढ़ने लगे, एक-दूसरे को शब्द दिखाने लगे और नए शब्द बनाने की कोशिश करने लगे।
इसमें किसन विशेष रूप से उत्साह के साथ भाग ले रहा था। वह रोज़ पेड़ पर लगे शब्द कार्ड पढ़ता था। इतना ही नहीं, छुट्टी के दिन भी वह आकर उन शब्दों को पढ़ता था। धीरे-धीरे उसे नए शब्द समझ में आने लगे और वह उनसे छोटे वाक्य भी बनाने लगा। इस गतिविधि के कारण पेड़ के नीचे की यह जगह बच्चों के लिए एक तरह की लाइब्रेरी बन गई। जब भी उन्हें समय मिलता, वे वहाँ जाकर कार्ड पर लिखे शब्द पढ़ते थे।
इस अनुभव से यह स्पष्ट हुआ कि सीमित संसाधनों के बावजूद भी थोड़ी रचनात्मकता और उत्साह के साथ बच्चों की पढ़ाई को प्रभावी बनाया जा सकता है। पेड़ के नीचे की यह ओपन क्लासरूम बच्चों के लिए सीखने का एक आनंददायक और अलग अनुभव साबित हुई है।
इंटर्नशिप – एक बदलाव की यात्रा
निकिता, निखिल

वर्तमान में इंटर्नशिप प्रोग्राम की चौथी बैच चल रही है। जब इस प्रोग्राम की शुरुआत की गई थी, तब Batch 1 में लगभग 10 इंटर्न शामिल हुए थे। इन इंटर्न्स के लिए यह अनुभव पूरी तरह नया था।
शुरुआत में कई लोगों को अंग्रेज़ी संचार, आत्मविश्वास और काम की आदत जैसी चीज़ों में कठिनाइयाँ आ रही थीं। फिर भी उन्होंने सीखने की इच्छा के साथ इस यात्रा की शुरुआत की।
इसके बाद Batch 2 में भी 10 इंटर्न और Batch 3 में 12 इंटर्न शामिल हुए। हर बैच के साथ हमारा दृष्टिकोण और भी स्पष्ट और मजबूत होता गया। इस यात्रा में Batch 4 में अचानक बड़ी वृद्धि हुई और लगभग 30 इंटर्न इस कार्यक्रम से जुड़े। यह वृद्धि केवल संख्या में ही नहीं थी, बल्कि प्रोग्राम के प्रति बढ़ते विश्वास और उसके प्रभाव को भी दर्शाती है।
इस पूरे सफर में हमारा मुख्य ध्यान इंटर्न्स को सक्षम (empower) बनाने पर रहा। उनके कौशल और काम की गुणवत्ता पर लगातार काम किया गया। अंग्रेज़ी सुधारने के लिए हमने स्पीकिंग क्लब शुरू किया, जहाँ इंटर्न्स को नियमित रूप से बोलने का अवसर मिला। साथ ही, रोज़ छोटे-छोटे कार्य देकर उनके अभ्यास पर ध्यान दिया गया, जिससे उनका आत्मविश्वास धीरे-धीरे बढ़ने लगा।
हमने इंटर्न्स को इकोसिस्टम में प्लेसमेंट के अवसर भी उपलब्ध कराए। इन अवसरों का सही उपयोग करते हुए 3 इंटर्न्स का प्लेसमेंट हुआ, और 6 इंटर्न्स को CLR के इंग्लिश प्रोजेक्ट के लिए चुना गया। ये सफल उदाहरण अन्य इंटर्न्स के लिए भी प्रेरणादायक बने।
इस पूरी यात्रा के दौरान इंटर्न्स ने ownership, teamwork, interdependency और observation जैसे महत्वपूर्ण गुणों का विकास किया। जो इंटर्न शुरुआत में थोड़ा झिझकते थे, वही आगे चलकर जिम्मेदारी लेने लगे, एक-दूसरे की मदद करने लगे और टीम के रूप में काम करने लगे।
इसके साथ ही उन्होंने अंग्रेज़ी भाषा और संचार कौशल में भी अच्छी प्रगति की। नियमित अभ्यास, फीडबैक और सहयोगी वातावरण के कारण उनके अंदर सकारात्मक बदलाव स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगे।
कुल मिलाकर, यह इंटर्नशिप प्रोग्राम केवल सीखने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इंटर्न्स को आत्मविश्वासी, जिम्मेदार और भविष्य के अवसरों के लिए तैयार करने वाला एक मजबूत मंच साबित हुआ। यह यात्रा केवल कौशल विकास की नहीं, बल्कि व्यक्तित्व विकास और आत्मविश्वास बढ़ाने का भी एक महत्वपूर्ण चरण रही।