चक्रीघाट – बच्चों को मिली सीखने की नई राह
चक्रीघाट – बच्चों को मिली सीखने की नई राह

चक्रीघाट – बच्चों को मिली सीखने की नई राह

– कोमल गौतम

चक्रीघाट बेडे के स्थानांतरण के बाद कुछ परिवार चांपा गांव के पास आकर रहने लगे हैं।

उनमें से कुछ बच्चे अपने परिवार के साथ चांपा में रह रहे हैं, जबकि कुछ बच्चे अभी भी अपने माता-पिता के साथ स्थानांतरित हो रहे हैं।

चांपा गांव में बच्चों को नियमित रूप से पढ़ाना शुरू करने के बाद उनके व्यवहार और सीखने में सकारात्मक बदलाव दिखाई देने लगा है। बच्चे अब नियमित रूप से कक्षा में बैठते हैं, ध्यान से पढ़ते हैं और दिए गए काम को करने की कोशिश करते हैं। धीरे-धीरे उनका आत्मविश्वास भी बढ़ता हुआ दिखाई दे रहा है।लेकिन जो बच्चे अभी भी अपने माता-पिता के साथ स्थानांतरित बेडो में रह रहे हैं, उनमें ऐसा बदलाव दिखाई नहीं दे रहा है।

सव्वा इस समय अपने दादा-दादी के साथ चांपा में रह रहा है, जबकि उसका छोटा भाई जगदीश अभी भी अपने माता-पिता के साथ स्थानांतरित बेडे पर रहता है। पहले सव्वा पढ़ाई में रुचि नहीं लेता था और कक्षा में भी ठीक से नहीं बैठता था, लेकिन अब उसमें काफी बदलाव दिखाई दे रहा है।

वह नियमित रूप से कक्षा में बैठता है, ध्यान से पढ़ता है और खुद से पढ़ाई करने की कोशिश करता है। शनिवार-रविवार की छुट्टी में जब उसके पिता उसे अपने साथ बेडे पर ले जाते हैं, तब वह वहां दूध का हिसाब करते हुए भी दिखाई देता है। इससे उसके माता-पिता को भी शिक्षा का महत्व समझ में आने लगा है।

जगदीश के मामले में भी कुछ ऐसा ही हुआ। उसे चांपा में पढ़ने के लिए भेजने के लिए हम उसकी मां से बार-बार बात कर रहे थे, लेकिन शुरुआत में उन्होंने उसे स्कूल नहीं भेजा। बाद में जब हम उनकी स्थानांतरित बेडे पर गए, तो हमने उनसे सीधे बातचीत की और समझाया कि अगर जगदीश को शिक्षा का अवसर नहीं मिला, तो उसका कितना नुकसान हो सकता है।

इस बातचीत के बाद अगले ही दिन उन्होंने जगदीश को पढ़ने के लिए चांपा भेज दिया। अब उसे भी पढ़ने का मौका मिल रहा है। आगे उसमें भी सकारात्मक बदलाव देखने को मिलेंगे, ऐसी आशा है।

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